सत्यजित रे की प्रासंगिकता

विश्व सिनेमा के करीब सवा सौ सालों के इतिहास को सजाने-संवारने में जिन फिल्मकारों की सबसे अहम भूमिका रही है, सत्यजित रे का नाम उनमें शामिल है. उनका जन्म दो मई, 1921 को कोलकाता में हुआ था और वहीं 23 अप्रैल, 1992 को उन्होंने अपनी आखिरी सांस ली. ‘पाथेर पंचाली’ (1955) से ‘आंगतुक’ (1991) तक की उनकी शानदार सिनेमाई यात्रा ने भारतीय सिनेमा को तो गहरे से प्रभावित किया ही, दुनिया के विभिन्न देशों के फिल्मकारों पर भी असर छोड़ा. महान जापानी फिल्मकार अकिरा कुरोसावा ने रे के जीवनीकार एंड्र्यू रॉबिंसन को लिखा था कि सत्यजित रे की फिल्में नहीं देखना सूरज या चांद को नहीं देखने के बराबर है. मशहूर अमेरिकी निर्माता-निर्देशक मार्टिन स्कॉरसिसी ने उन्हें चार ‘महान’ फिल्मकारों में गिना है. उनकी सूची में रे का नाम कुरोसावा, फेडेरिको फेलिनी और इंगमार बर्गमैन के साथ है. फोटोग्राफी जगत के सबसे बड़े नाम हेनरी कार्टियर ब्रेसों ने उन्हें ‘निःसंदेह फिल्मी दुनिया का एक बड़ा नाम’ कहा है. भारतीय सिनेमा में खास मुकाम रखनेवाले श्याम बेनेगल कहते हैं कि फिल्म बनाने की आकांक्षा रखनेवाले उनके जैसे व्यक्ति के लिए ‘पाथेर पंचाली’ ने संभावनाओं की एक दुनिया खोल दी और उसने मुझे फिल्म के अन्य प्रभावों से बाहर निकलने में मेरी मदद की.

movieposterकुछेक अपवादों को छोड़ दें, तो सत्यजित रे की सभी फिल्में बांग्ला में हैं. बंगाली समुदाय के लिए वे एक महान फिल्मकार या कला-संस्कृति के प्रतीक ही नहीं हैं, बल्कि आजादी के बाद उस समुदाय की सोच-समझ को गंभीरता से प्रभावित करनेवाले व्यक्तित्व हैं. इस असर की वजह यह है कि रे ने सिनेमा के अलावा भी बहुत कुछ योगदान दिया है. वे फिल्म-निर्माण के विभिन्न विभागों में दखल रखते थे- लेखन, डिजाइन, स्टोरी बोर्ड, वेश-भूषा, संगीत आदि. उन्होंने अपनी अनेक फिल्मों में खुद या पंडित रविशंकर के साथ संगीत दिया था. कैमरा संचालन के साथ फिल्मों के टाइटल, पोस्टर, क्रेडिट आदि रचने के साथ वे कैलिग्राफी में भी सिद्धहस्त थे तथा चित्रकारी भी बखूबी कर लेते थे. उन्होंने साहित्य रचने के साथ सिनेमा पर खूब लिखा भी है. उनकी पुस्तकें कला-संस्कृति के हर प्रेमी के लिए जरूरी पाठ हैं. उनके उपन्यास और कहानी संग्रह को भी पाठकों की अनेक पीढ़ियों का प्यार मिला है. उनकी फिल्में हर लिहाज से सराही गयी हैं और फिल्म अध्ययन में आज उनका स्थान अप्रतिम है. इससे उनकी बहुमुखी प्रतिभा और वैविध्य का अनुमान लगाया जा सकता है.

जब हम सत्यजित रे को भारतीय सिनेमा के लिहाज से याद करते हैं, तो यह जरूर कहते हैं कि हमारे फिल्मकारों की एक बड़ी जमात उनकी छाया में पली और बढ़ी. लेकिन इस संदर्भ में एक निराशाजनक बात यह है कि बंगाल से बाहर शेष भारत में उनकी फिल्में सिर्फ परिष्कृत रूचि के बहुत-थोड़े दर्शकों तक ही पहुंच पायीं और वे भी विशेष आयोजनों के जरिये, न कि सामान्य सिनेमा थियेटरों के माध्यम से. इस सच का एक आयाम यह है कि भारत में अलग-अलग भाषाओं की अच्छी फिल्में अपनी हदों से आगे बहुत अधिक प्रचार-प्रसार नहीं हासिल कर पाती हैं. सिनेमा वितरण के कारोबारियों और सिनेमा को बढ़ाने में लगे सरकारी विभागों को ऐसी विसंगतियों पर ठीक से ध्यान देना चाहिए. यह भी उल्लेखनीय है कि सत्यजित रे की फिल्में व्यावसायिक दृष्टि से भी कामयाब रही हैं. अगर समुचित तरीके से अच्छी फिल्मों का वितरण हो, तो भारतीय दर्शक उन्हें अवश्य स्वीकार करता है. अब चूंकि फिल्में देखने के कई तौर-तरीके मौजूद हैं, तब रे जैसे फिल्मकारों को नये दर्शकों तक पहुंचाने की पूरजोर कोशिश होनी चाहिए.

सत्यजित रे एकमात्र भारतीय फिल्मकार हैं जिन्हें ऑस्कर पुरस्कारों का प्रतीष्ठित ‘लाइफटाइम एचीवमेंट अवार्ड’ मिला है. कृतज्ञ राष्ट्र ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से विभूषित किया है. जन-जीवन के विषयों को यूरोपीय सिनेमा की यथार्थवादी शैली में परदे पर लानेवाले रे ने भारतीय कला-परंपरा, विशेषकर लोक संस्कृति, से प्रचुर बिंब उठाये हैं. उनके दृश्य गीतात्मक हैं और दुरुह प्रसंगों के फिल्मांकन में भी उन्होंने कठोरता से हमेशा परहेज किया है. देशी-विदेशी सिनेमा की परतों को मली-भांति समझने के कारण वे नया व्याकरण रच पाने में सफल रहे और इन्हीं सब कारणों से सिनेमा इतिहास में वे एक नया अध्याय जोड़ सके. वर्ष 1948 में उन्होंने भारतीय सिनेमा की कमजोरियों पर एक लेख लिखा था. लेकिन, वे अन्य टिप्पणीकारों की तरह सिर्फ आलोचना या समीक्षा तक ही सीमित नहीं रहे तथा अपनी प्रतिभा और दृष्टि से सात साल के भीतर ही ‘पाथेर पंचाली’ बनाकर सकारात्मक हस्तक्षेप कर दिया. बाद का सिलसिला तो तारीख में ही तब्दील हो गया. जिस तरह से उनके भीतर के कला एवं संस्कृति के रसिक और साधक ने बंगाली और शेष भारत के कला-रूपों से प्रेरणा ली थी, उसी तरह से साहित्यकार होने के नाते वे स्थानीय साहित्य के महत्व से भी परिचित थे. उनकी तमाम फिल्में विभिन्न साहित्यिक कृतियों पर आधारित हैं. कलाओं की विविधता को संजोने का यह अनूठा आग्रह शायद ही देश के किसी अन्य फिल्मकार में इतनी पूर्णता और दक्षता से साकार होता है.       

वे मानते थे कि ‘सिनेमा का कच्चा माल जीवन ही है. ऐसा संभव ही नहीं है कि चित्रकला, संगीत और काव्य को उच्च स्तर पर प्रेरित करनेवाला देश फिल्मकारों को प्रभावित न करे. फिल्मकार को बस अपनी आंखें और कान खुले रखने हैं’. उनकी एक उक्ति उनके जला-दर्शन को इंगित तो करता ही है, फिल्मकारों की वर्तमान पीढ़ी को एक महत्वपूर्ण सूत्र भी प्रदान करता है. आशा है कि सत्यजित रे की प्रेरणा से फिल्मकार भारतीय सिनेमा को नयी ऊंचाई तक ले जा सकेंगे. 

यहाँ पॉडकास्ट सुनें.

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