श्रीदेवी का जादू बरकरार रहेगा

वर्ष 1972 में कौन कह सकता था कि ‘रानी मेरा नाम’ में बाल भूमिका निभानेवाली श्रीदेवी हिंदी सिनेमा के दर्शकों के दिलों पर रूप की रानी बन कर सालों तक राज करेंगी! या फिर यह कि तीन साल के बाद आयी ‘जूली’ की किशोरी इरने 1980 और 1990 के दशक में बॉलीवुड की सबसे शोख अदाकारा बन जायेगी! सिनेमा के किसी भी पैमाने से देखें, तो अभिनेत्री श्रीदेवी का स्थान विशिष्ट श्रेणी में है. उन्होंने पचास साल के करियर में अनेक भाषाओं में 300 फिल्में कीं. सफलता की उस ऊंचाई तक गयीं कि उन्हें पहली ‘फीमेल सुपरस्टार’ की संज्ञा मिली. बचपन से जवानी और फिर इस उम्र तक उन्होंने भूमिकाओं की इतनी विविधताएं अपने खाते में दर्ज किया कि किसी भी अभिनेता या अभिनेत्री के लिए उस स्तर तक पहुंच पाना दूर की कौड़ी है.

हर रूप और रंग के किरदार निभाने के लिहाज से हिंदी सिनेमा में यदि किसी अभिनेता से उनकी तुलना हो सकती है, तो शायद वे शम्मी कपूर थे. जिस तरह से 1960 के दशक में शम्मी कपूर ने परदे के नायक की हर पुरानी छवि से इतर एक नया अंदाज बिखेरा, उसी तरह से श्रीदेवी ने नायिका के किरदार की स्थापित मान्यताओं की हद को तोड़ते हुए अलग-अलग तरह की भूमिकाएं निभायीं.

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यह कहते हुए हमें यह भी याद रखना चाहिए कि हिंदी सिनेमा में वयस्क भूमिकाओं में आने से पहले वह दक्षिण में स्थापित हो चुकी थीं और उनकी खास फिल्मों में कई फिल्में तमिल, तेलगू और मलयालम की हैं. अपने जीवन के कुल 54 बरस में से 50 बरस उन्होंने सिनेमा को दिये. स्टारडम तो कुछ फिल्में सफल होने पर भी हासिल हो सकता है, परंतु इतने लंबे समय की लोकप्रियता और दर्शकों की तीन पीढ़ियों में साख कुछ ही स्टारों की किस्मत में आ सके हैं.

इस संदर्भ में यह भी याद रखा जाना चाहिए कि पुरुष अभिनेताओं के बरक्स महिला अभिनेत्रियों के लिए सिनेमा इंडस्ट्री में लंबे समय तक बने रहना बेहद मुश्किल मामला है. ग्लैमर और आकर्षण को बनाये रखने के साथ फिल्मों की सफलता की गारंटी की चुनौती आसान मामला नहीं होता. इस कारण भी श्रीदेवी का स्टारडम उल्लेखनीय बन जाता है. कई सालों के अंतराल के बाद जब वे परिपक्व महिला के रूप में ‘इंग्लिश विंग्लिश’ और ‘मॉम’ में आयीं, तो फिर दर्शकों ने उन्हें सर-आंखों पर बैठाया. ध्यान रहे, आज के दर्शकों का बहुत बड़ा हिस्सा उन युवाओं का है, जो तब पैदा हुए थे, जब श्रीदेवी बतौर नायिका धीरे-धीरे परदे से विदा ले रही थीं और स्टार अभिनेत्रियों की नयी कतार परदे पर नमूदार हो चुकी थी. भले ही विभिन्न भाषाओं के उनके दर्शक और प्रशंसक उनकी 300 फिल्मों में ज्यादातर फिल्में नहीं देखे होंगे या नहीं देखेंगे, पर लंबे समय तक बेहतर काम करने और इतनी बड़ी संख्या में फिल्में देने का नतीजा है कि उनका जादू आज भी बरकरार है.

फिल्म स्टूडियो के तामझाम के साथ ही श्रीदेवी पली-बढ़ी थीं. ऐसे में उनके लिए कैमरा या सेट की हलचल बेहद स्वाभाविक बातें थीं. पॉपुलर सिनेमा के हिसाब-किताब और पैंतरों से करीब होने के कारण भी उन्हें अभिनय के अलग-अलग तेवर दिखाने में भी सहूलियत रही होगी. तभी वे लगातार काम कर सकीं और शिखर पर बनी रहीं. भारतीय सिनेमा में अलग-अलग समयों पर बदलाव होते रहे हैं. जब श्रीदेवी वयस्क भूमिकाओं के लिए तैयार हो रही थीं, तब दक्षिण का सिनेमा भी बदल रहा था और बॉलीवुड भी. श्रीदेवी उन सभी शर्तों पर खरी उतर रही थीं, जो इस बदलते सिनेमा को दरकार थी. वह आम लड़की की भूमिका कर सकती थीं, जो गानों के ख्वाबीदा दृश्यों में मादक और ग्लैमरस दिख सकती थीं. वे एक्शन की भूमिकाएं कर सकती हैं और हर तरह के कपड़े में परदे पर जलवानुमा हो सकती थीं.

अभिनय की तालीम हो, नृत्य की खूबी हो या फिर निर्देशक के हिसाब से काम करने का मसला हो- यह सब उन्होंने स्टूडियो में ही सीखा. इन चीजों का गहन और व्यवस्थित प्रशिक्षण उन्होंने कभी नहीं लिया. यह बहुत बड़ा कारण है कि श्रीदेवी परदे पर चाहे जो कर रही हों, वह बहुत स्वाभाविक लगती हैं. एक उदाहरण से इसे समझा जा सकता है. विख्यात निर्देशक के बालाचंदर ने तमिल फिल्म ‘मूंद्रू मुदिचु’ में उन्हें एक अधेड़ विधुर की पत्नी की भूमिका दी थी. वयस्क भूमिका में श्रीदेवी की यह पहली फिल्म थी और तब उनकी उम्र महज तेरह साल थी.

हिंदी सिनेमा में उन्होंने नायिका के रूप में भारतीराजा की ‘सोलवां सावन’ (1978) से कदम रखा. यह फिल्म चल नहीं पायी. पांच साल के अंतराल के बाद आयी के राघवेंद्र राव की ‘हिम्मतवाला’ ने सफलता के झंडे गाड़े और फिर न तो श्रीदेवी ने पीछे मुड़ कर देखा और न ही दर्शकों ने कभी उन्हें निराश किया. फिर ‘मवाली’, ‘तोहफा’, ‘सदमा’, ‘मिस्टर इंडिया’, ‘कर्मा’, ‘चांदनी’, ‘चालबाज’, ‘खुदागवाह’ जैसी कई फिल्मों ने उन्हें स्टारडम के शिखर पर बनाये रखा.  

श्रीदेवी की जोरदार कामयाबी इसलिए भी खास है कि किसी भी फिल्म इंडस्ट्री में उनका कोई गॉडफादर नहीं था. वह काम करना जानती थी और उन्होंने बखूबी काम किया. उन्होंने हर तरह की भूमिकाएं कीं और हर तरह के निर्देशकों के साथ काम किया. पॉपुलर सिनेमा को लेकर उनका ऐसा समर्पण अनूठा है. यही वह वजह है जो उन्हें भारतीय सिनेमा के इतिहास में हमेशा चमकता सितारा बना कर रखेगी.

 
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