प्यार के गीत पर बेमतलब विवाद

तुरंता क्लिक और शेयर से लैस इंटरनेट पर कब क्या वायरल हो जाये, कहना मुश्किल है. वैलेंटाइन डे के एक दिन पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो क्लिप अचानक चर्चित हो उठा. निर्माणाधीन मलयालम फिल्म ‘ओरु अदार लव’ के इस वीडियो क्लिप में एक स्कूल के सांस्कृतिक आयोजन में अभिनेता रोशन अब्दुल रऊफ और अभिनेत्री प्रिया प्रकाश वरियर एक-दूसरे को देख रहे हैं और आंखों से इशारे कर रहे हैं. रोशन को तो बहुत लोकप्रियता नहीं मिली है, पर वीडियो में शरारती भाव-भंगिमा बनाती 18-वर्षीया वैरियर सोशल मीडिया पर लाखों लोगों की चहेती बन गयी हैं. वे त्रिशूर के विमला कॉलेज में बी कॉम की छात्रा हैं और रोशन एक टेलीविजन डांस शो के फाइनलिस्ट हैं. इन दोनों की यह पहली फीचर फिल्म है.

यह विडंबना ही है कि निर्दोष किशोर प्रेम और आकर्षण को दर्शाते क्लिप और उसकी पृष्ठभूमि में बजते गाने पर नाराज कुछ लोग अपनी धार्मिक भावनाएं आहत होने की बात कह कर मुकदमा भी दर्ज करा चुके हैं. यह कोई नयी बात भी नहीं है. हमारे देश में धर्म, जाति और क्षेत्र को लेकर सिनेमा और किताबों से नाराज होने का सिलसिला पुराना है.    

हैदराबाद में दर्ज मुकदमे में आरोप लगाया है कि इस क्लिप के साथ जो गाना बज रहा है, वह पैगंबर मोहम्मद और उनकी पहली पत्नी खदीजा के बारे में है, इसलिए ऐसे दृश्य आपत्तिजनक हैं. इस शिकायत में प्रिया वैरियर और फिल्म के निर्देशक ओमर लुलु को नामजद किया गया है. मुंबई की एक संस्था रजा एकेडमी ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के प्रमुख प्रसून जोशी से इस वीडियो को रोकने की मांग की है. इस कथित विवाद के संदर्भ में यह जानना बहुत दिलचस्प है कि यह गाना नया नहीं है और कई सालों से केरल के उत्तरी इलाकों में बड़े चाव से सुना और गाया जाता है.

यह ‘मनिक्या मालाराया पूवी’ गीत को पीएमए जब्बार ने 1978 में लिखा था और उस समय उसकी धुन टीके रफीक ने तैयार की थी. ऐसे गानों को केरल में ‘माप्पिला पट्टु’ कहा जाता है. ‘माप्पिला’ केरल के उत्तरी हिस्से में रहनेवाले मुस्लिम समुदाय को कहते हैं तथा ‘पट्टु’ का अर्थ गीत होता है. गीत-संगीत-नृत्य की इस लोक परंपरा में पैगंबर मोहम्म्द, प्रेम, शांति और युद्ध के गाने गाये जाते हैं. ्शादी-विवाह, त्योहारों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में ऐसे गीत खूब गाये जाते हैं. ‘द न्यूज मिनट’ में मेघा वरियर ने बताया है कि इन गीतों में अरबी और मलयालम के साथ उर्दू, फारसी, हिंदी, तमिल, संस्कृत और कन्नड़ शब्दों का इस्तेमाल होता है तथा यह परंपरा मुस्लिम समुदाय में सदियों से मौजूद है. इस परंपरा में मालाप्पट्टु- पवित्र व्यक्तियों के बारे में गीत, उरुदी या पदापट्टु- युद्ध की कथाएं, विरुथांगल- ईश्वर की प्रशंसा, किस्सुकल- इस्लाम के नबियों की कहानियों की गीतात्मक प्रस्तुति, खेस्सुकल- रोमांटिक गीत समेत शादी-ब्याह के गीत होते हैं. एक नृत्य विधा ‘ओप्पाना’ में भी पैगंबर और उनकी पत्नियों के प्रेम के गीत गाये जाते हैं.

मेघा वरियर ने अपने लेख में वरिष्ठ मलयालम पत्रकार आयेशा महमूद का बयान उल्लिखित किया है कि हैदराबाद में जो शिकायत दर्ज करायी गयी है, उसका एक कारण सांस्कृतिक भिन्नता हो सकती है. जहां केरल में गीत-संगीत के जरिये धार्मिक दास्तानों के प्यार के उल्लास की परंपरा है, वहीं अन्य जगहों पर ऐसा नहीं होता है. उसी लेख में मशहूर मप्पिला पट्टु गायक वीटी मुरली कहते हैं कि यह गीत तो जमाने से लोकप्रिय है, ऐसे में मौजूदा विवाद का कारण समझ में नहीं आता है. इसी परंपरा की बुजुर्ग गायिका नसीमा भी विवाद पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहती हैं कि इन गीतों से परिचित व्यक्ति को इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लग सकता है.

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जब 1978 में जब्बार ने यह गीत लिखा था, उनकी उम्र 20 साल थी. तब वे त्रिशूर के एक मदरसे में शिक्षक हुआ करते थे. इन दिनों वे सऊदी अरब की राजधानी रियाद में काम करते हैं. इस गाने की धुन तैयार करनेवाले रफीक ने जब गाया था था, तब भी यह बहुत लोकप्रिय हुआ था. रफीक उस समय आकाशवाणी और दूरदर्शन के जाने-माने गायक हुआ करते थे. बीते दो दशकों से अरब देशों में काम करनेवाले जब्बार ने 100 से अधिक गाने लिखे हैं तथा अपने गीत के नये अवतार पर संतुष्ट हैं. उन्होंने एक साक्षात्कार में शान रहमान के संगीत और लुलु के फिल्मांकन की प्रशंसा की है. यह भी उल्लेखनीय है कि निर्देशक लुलु ने किसी विवाद के दबाव में गाने को फिल्म से हटाने की किसी संभावना से इंकार कर दिया है.   

किसी भी ऐसे विवाद को शांत करने में सामाजिक और धार्मिक नेताओं की भूमिका अहम होती है. यह बहुत महत्वपूर्ण है कि केरल में कट्टरपंथी तत्वों की कमी नहीं है, पर इस फिल्म या गाने को लेकर एक भी नकारात्मक स्वर सुनने में नहीं आया है. इसके उलट अनेक धार्मिक नेताओं और विद्वानों से गाने और उसके फिल्मांकन का समर्थन ही किया है. इससे फिल्मकार को अपनी रचनात्मक स्वतंत्रता के पक्ष में डटे रहने में मदद मिलेगी. उम्मीद की जानी चाहिए कि हैदराबाद में शिकायत दर्ज करानेवाले कुछ लोग और विवाद में कूद पड़नेवाली रजा एकेडमी अपने रवैये पर पुनर्विचार करेंगे. चूंकि फिल्म की चर्चा अब केरल के दायरे से निकलकर पूरे देश में फैल चुकी है, तो यह आशा भी बंधती है कि जल्दी ही दर्शक इसे बड़े परदे पर देख पायेंगे. देखना यह भी है कि ओमर लुलु के निर्देशन में रोशन और प्रिया प्रकाश अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कितनी बेहतरी से करते हैं.

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