बॉलीवुड सितारों का सियासी सफर

सुपरस्टार रजनीकांत ने कई दशकों की अटकलों को विराम देते हुए राजनीति के मैदान में कूदने का ऐलान आखिरकार कर ही दिया है. अपने लंबे करियर में उन्होंने अनेक भाषाओं में 175 से अधिक फिल्में की हैं जिनमें ज्यादातर तमिल और तेलुगू में हैं. स्वाभाविक रूप से इस 67 वर्षीय अभिनेता के राजनीति में आने से सबसे अधिक असर तमिलनाडु की दो मुख्य पार्टियों- अन्ना द्रमुक और द्रमुक- पर होगा. अन्ना द्रमुक की स्थापना बेहद लोकप्रिय अभिनेता एमजी रामचंद्रन ने की थी और उसे अभिनेत्री जयललिता ने नयी ऊंचाई दी थी. दूसरी ओर द्रमुक के संस्थापक एम करुणानिधि स्थापित फिल्म लेखक रह चुके हैं.

MGR ANNA PERIYAR

अन्नादुरै, करुणानिधि, एमजीआर एवं पेरियार (्साभारः द हिंदू)

तमिल राजनीति में पेरियार और अन्नादुरै के द्रविड़ आंदोलन का एकछत्र वर्चस्व कायम करने में जितनी भूमिका राजनीतिक और सामाजिक कारणों की रही है, उतना ही प्रभाव सिनेमाई संस्कृति का भी रहा है. आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव से लेकर चिरंजीवी और पवन कल्याण तक यह परंपरा कायम है. केरल और कर्नाटक में ऐसे बड़े उदाहरण भले न मिलें, पर सिनेमा से जुड़े लोग खुले तौर पर विभिन्न दलों को समर्थन करते हैं और चुनाव लड़ते हैं.

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रजनीकांत (साभारः विकीपीडिया)

हिंदी सिनेमा में भी लोकप्रिय स्टारों की भरमार है और उनका प्रभाव क्षेत्र भी व्यापक है, पर सिनेमा से जुड़े लोगों का जो जलवा हम दक्षिण में देखते हैं, वैसा हिंदी सिनेमा में नहीं है. दक्षिण में 1960 के दशक से फैंस क्लबों का जो सिलसिला चला है, वैसा हिंदी पट्टी में नहीं है. यहां भी अभिनेता-अभिनेत्रियों के समर्पित प्रशंसक हैं और वे उनकी फिल्मों का इंतजार बहुत शिद्दत से करते हैं, पर वे सिनेमा हॉल को आस्था का स्थल नहीं बनाते. बहरहाल, बॉलीवुड के सितारों ने भी राजनीति में आजमाइश की है.

कभी प्रख्यात अभिनेता और फिल्मकार देव आनंद ने कहा था कि सियासत कमजोर दिलवालों के बस की बात नहीं है. देव साहब शायद अपने तजुर्बे से ऐसा कह रहे होंगे. वर्ष 1975-77 के आपातकाल और उस दौरान हुईं ज्यादतियों से क्षुब्ध होकर देव आनंद ने सिनेमा के कुछ साथियों के साथ मिलकर एक राजनीतिक दल का ही गठन कर दिया था. उनका उद्देश्य राजनेताओं को ‘सबक’ सिखाना तथा जानकार और विशेषज्ञ लोगों को सार्वजनिक जीवन में लाना था.

उनकी पार्टी का नाम रखा गया- नेशनल पार्टी ऑफ इंडिया. उस वक्त के अपने गुस्से का उल्लेख उन्होंने अपनी आत्मकथा में विस्तार से किया है. उनकी प्रेरणा तमिलनाडु के एमजी रामचंद्रन थे जो सिनेमा से सियासत में आकर जन-कल्याण की कामयाब नीतियां लागू कर रहे थे. पार्टी की स्थापना रैली में मुंबई के शिवाजी पार्क में भारी भीड़ जुटी थी तथा सभा को एफसी मेहरा और जीपी सिप्पी जैसे दिग्गज फिल्मकारों ने संबोधित किया था. बहरहाल, आम चुनाव में पार्टी की दुर्गति हो गयी और देव आनंद ने भी राजनीति से किनारा कर लिया. देव साहब चाहते तो किसी भी दल से संबद्ध होकर राजनीति में आ सकते थे. पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक बड़े नेताओं से उनके अच्छे संबंध थे. जब प्रधानमंत्री के रूप में अटल जी लाहौर गये तो उस ऐतिहासिक बस यात्रा में देव आनंद को भी ले गये थे.

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देव आनंद (साभारः विकीपीडिया)

‘किस्सा कुर्सी का’ जैसी फिल्म बना कर आपातकाल के दौरान संजय गांधी और विद्याचरण शुक्ल को बेहद नाराज करनेवाले अमृत नाहटा भी कांग्रेसी सांसद थे. कभी इंदिरा गांधी ने नरगिस दत्त को राज्यसभा में भेजा था, तो बाद में सुनील दत्त कांग्रेस की ओर से लोकसभा में आये. वर्ष 1984 में इलाहाबाद से लोकसभा के लिए चुने गये अमिताभ बच्चन के तीन-साला सियासी करियर की बातें अब कहानियां बन चुकी हैं. उनकी पत्नी और ख्यात अभिनेत्री जया बच्चन समाजवादी पार्टी से लंबे समय से संसद में हैं. जया प्रदा भी समाजवादी पार्टी की तरफ से सांसद रही हैं.

अभिनेत्री और समाजसेविका शबाना आजमी तथा गीतकार-लेखक जावेद अख्तर भी मनोनीत सांसद रह चुके हैं. रेखा भी इस श्रेणी में हैं. भाजपा की ओर से पहले विनोद खन्ना और धर्मेंद्र सांसद रह चुके हैं तथा अभी हेमामालिनी और शत्रुघ्न सिन्हा लोकसभा में हैं. अस्सी और नब्बे के दशक के अभिनेता गोविंदा और राजबब्बर कांग्रेस से जुड़े हुए हैं. दोनों सांसद भी रह चुके हैं. यह सूची राजेश खन्ना के उल्लेख के बिना कैसे पूरी हो सकती है जिन्होंने कांग्रेस की ओर से संसद में प्रतिनिधित्व दिया. शेखर सुमन ने भी आजमाइश की कोशिश की, पर वे सफल न हो सके. इनके अलावा रामानंद सागर के लोकप्रिय टीवी धारावाहिक ‘रामायण’ और बीआर चोपड़ा के प्रख्यात धारावाहिक ‘महाभारत’ के कई कलाकार राजनीति में आये. इनमें कुछ सांसद बने, कुछ प्रचारक.

पिछले लोकसभा चुनाव में फिल्मी हस्तियों की मौजूदगी हर लिहाज से ऐतिहासिक रही. भाजपा और कांग्रेस के साथ विभिन्न दलों के लिए अनेक फिल्मी कलाकारों ने चुनाव लड़ा या फिर चुनाव प्रचार किया. दोनों बड़ी पार्टियों की तरफ से कम-से-कम 30 सितारे प्रचार कर रहे थे. यदि उत्तर भारत के साथ पूर्वी भारत की क्षेत्रीय फिल्मों को ले लें, तो परेश रावल, किरण खेर, मनोज तिवारी, अंगूरलता डेका, मूनमून सेन, शताब्दी रॉय, बाबुल सुप्रियो, संध्या रॉय आदि संसद पहुंचे. गुल पनाग, रवि किशन, नग्मा, राज बब्बर, बप्पी लाहिड़ी, जॉय बनर्जी, महेश मांजरेकर जैसे उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत सके.

दक्षिण से उत्तर, पश्चिम या पूर्व का बड़ा अंतर यह है कि उत्तर, पश्चिम या पूर्व में सितारों ने स्थापित पार्टियों के सहारे राजनीति में सहभागिता की है, लेकिन दक्षिण में फिल्मी कलाकारों ने अपने नाम और दम पर असर पैदा किया है. एमजी रामचंद्रन, जयललिता या एनटी रामाराव, यहां तक कि चिरंजीवी या विजयकांत जैसा एक भी उदाहरण हिंदी सिनेमा या किसी अन्य क्षेत्रीय सिनेमा में नहीं मिलता. वैसे हमारे सितारे रजनीकांत के नये तेवर पर जरूर नजरें जमाये बैठे होंगे, हम सभी की तरह…

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