‘मोहल्ला अस्सी’ जल्दी आ सकती है परदे पर

सिनेमा के साथ यह अजीब विडंबना है कि कई बार अच्छी फिल्में या तो सेंसर बोर्ड के पचड़े या निर्माता-निर्देशक-वितरक के झगड़े में फंस कर परदे पर आने से वंचित रह जाती हैं. विनय तिवारी द्वारा निर्मित और डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेद्वी द्वारा निर्देशित ‘मोहल्ला अस्सी’ के बारे में भी यही आशंका घर करने लगी थी कि शायद इस फिल्म की किस्मत में बड़े परदे पर आना नहीं लिखा है. हिंदी साहित्य के बड़े हस्ताक्षर प्रोफेसर काशीनाथ सिंह की चर्चित कृति ‘काशी का अस्सी’ पर आधारित इस फिल्म को लेकर शुरू से ही बड़ी उत्सुकता रही है.

बनारस एक पुरातन धार्मिक और सांस्कृतिक शहर है तथा इस शहर का अपना एक खास तेवर है. सदियों से आध्यात्मिकता और दर्शन के साथ धार्मिक आचार-व्यवहार और कर्मकांडों के लिए भी काशी जाना जाता रहा है. अब ऐसे शहर में धर्म के साथ भोग और धार्मिकता के नाम पर पाखंड और कमाई का होना भी कोई अचरज की बात नहीं है. काशीनाथ सिंह ने आधुनिक बनारस के बदलते रंग-ढंग को रेखांकित करने की कोशिश की है. राजनीतिक और आर्थिक बदलाव के असर का आकलन भी उन्होंने बखूबी किया है. इस उपन्यास में बनारस का भोलापन, अक्खड़पन और भदेसपन के साथ भाषा की बेबाकी के भी रंग हैं. अब ऐसी लोकप्रिय कृति पर डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेद्वी जैसा निर्देशक फिल्म बनाये, तो चर्चा और उत्साह का आलम स्वाभाविक ही है.

इसके साथ यह भी उल्लेखनीय है कि हिंदी मुख्यधारा के फिल्मकार साहित्यिक रचानाओं पर फिल्में बनाने में न के बराबर दिलचस्पी लेते रहे हैं. कुछ गिनी-चुनी फिल्में बनीं भी, तो उन्हें बॉक्स ऑफिस पर असफलता का मुंह देखना पड़ा. हिंदी सिनेमा के विषयों के रूझान सफल फॉर्मुला फिल्में तय करती हैं. बहरहाल, फिल्म में मुख्य भूमिकाओं के लिए ख्यात अभिनेता सन्नी देओल और अभिनेत्री साक्षी तंवर को तैयार कर निर्देशक ने यह संकेत भी दे दिया था कि वे फिल्म को प्रभावी बनाने के लिए हरसंभव प्रयास करेंगे. ग्लैमर से रहित पूर्वांचल के शहर के कस्बाई माहौल में ठेठ चरित्रों को जीने के लिए सहमति देकर इन कलाकारों ने भी अपनी नेकनियती दिखायी.

mohalla-assiउपन्यास का कथानक बनारस के जाने-माने मोहल्ले अस्सी में घटित होता है तथा वहीं की चाय-दुकानों, सड़कों, बाजारों तथा घरों में उसके किरदार रमते हैं. सुबहो-शाम की बतकही और रोजमर्रा की सामान्य घटनाओं के जरिये उपन्यासकार ने बनारस की आत्मा और उसके आवरण को पाठकों के सामने रख दिया है. फिल्म में यथार्थ के बोध को बरकरार रखने के लिए निर्देशक ने उन्हीं इलाकों में ज्यादातर फिल्मांकन किया तथा जब स्टूडियो में सेट बनाने की जरूरत पड़ी, तो असली अस्सी को मुंबई में रच दिया गया. फिल्म कहीं उपन्यास के मूल बोध और तेवर से कहीं भटक न जाये, इसे सुनिश्चित करने के लिए निर्देशक ने रचनाकार को हमेशा निर्माण-प्रक्रिया से जोड़ कर रखा. धारावाहिक ‘चाणक्य’ हो या फिर अमृता प्रीतम की रचना पर बनी ‘पिंजर’, निर्देशक द्विवेद्वी की इस खासियत को तो मानना ही पड़ेगा कि वे कथा के साथ उसके परिवेश को भी बारीकी से उकेरते हैं. ऐसे में किसी को यह सुबहा नहीं रह जाता है कि ‘काशी का अस्सी’ परदे पर ठीक से अवतरित हो सकेगी या नहीं. यह भी उल्लेखनीय है कि उपन्यास के एक हिस्से को लेकर उसकी पूरी आत्मा का फिल्मांकन एक बड़ी चुनौती है.

खैर, फिल्मकार की मंशा चाहे जैसी हो या उसके काम का महत्व चाहे जो हो, फिल्मों को सार्वजनिक प्रदर्शन की मंजूरी देनेवाली संस्था केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड, जिसे हम आम तौर पर सेंसर बोर्ड के नाम से जानते हैं, की अपनी कार्य-शैली है. जब दो साल पहले याह फिल्म उसके सामने गयी, तो उसने दस दृश्यों पर आपत्ति जतायी और उन्हें काटने का आदेश दिया. बोर्ड के इस रवैये के विरुद्ध निर्माता ने दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया. न्यायालय ने सिर्फ एक दृश्य को हटाने तथा फिल्म को ‘व्यस्क’ सर्टिफिकेट के साथ तुरंत मंजूरी देने का आदेश दिया है. यह मामला एक और उदाहरण है जो हमें निर्दिष्ट करता है कि सेंसर के कामकाज पर नये सिरे से विचार किया जाये. इस आदेश के बाद निर्माता ने कहा है कि वे जल्दी ही फिल्म को प्रदर्शित करने जा रहे हैं.

हालांकि कानूनी अड़चनें दूर हो चुकी हैं, परंतु फिल्म को सिनेमाघर तक लाने की राह कम उबड़-खाबड़ नहीं है. बड़े स्टार-कास्ट और बड़ी बजट की फिल्मों को अगर छोड़ दें, तो हर फिल्म को इस पथरीली राह से गुजरना होता है जहां वितरक और सिनेमाघर के मालिक कमाई को लेकर चिंतित होते हैं तथा उनकी चाहत होती है कि फिल्म निर्माता उनकी इस चिंता को धन निवेशित कर या फिर मुनाफे में मोटी हिस्सेदारी देकर दूर करे. यही कारण है कि आज फिल्मों के बजट में फिल्म बनाने से कहीं अधिक उसके विज्ञापन और वितरण का खर्च शामिल होता है. ‘मोहल्ला अस्सी’ के सामने भी ये चुनौतियां होंगी. फिल्म को लेकर उत्साह कम हो चुका है, कथित रूप से उसे अवैध रूप से कुछ समय पहले इंटरनेट पर डाला गया था, ठीक से प्रचार के लिए निर्माता को खर्च करना पड़ेगा- इए समस्याएं आज इस फिल्म के सामने हैं. पहले निर्माता और निर्देशक के बीच कुछ तनातनी की खबरें भी आयी थीं. यदि फिल्म को ठीक से दर्शकों के बीच में ले जाना है, तो निर्माता को इन दिक्कतों को तुरंत ठीक करना होगा. बतौर दर्शक हम तो यही उम्मीद करेंगे कि फिल्म जल्दी प्रदर्शित हो और हम परदे पर बनारस के विविध रूपों का रसास्वादन कर सकें.          

 
 
 
 
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