सिनेमा और रंगमंच को बहुत दिया शशि कपूर ने

कला और सृजन में रची-बसी आठ दहाईयों की जिंदगी जीने के बाद जब दुनिया को शशि कपूर ने अलविदा कहा, तो उनकी पहचान की पहली संज्ञा- बलबीर पृथ्वीराज कपूर- का ध्यान शायद ही किसी को आया होगा. माता रामसरणी कपूर और पिता पृथ्वीराज कपूर के दिये गये नाम की जगह उनका यह सबसे छोटा बेटा अपने पिता की थियेटर कंपनी- पृथ्वी थियेटर- के नाटकों में शशिराज के नाम से मंच पर जाता था. इसी नाम से वे देश-दुनिया में मशहूर हुए. यह भी कमाल है कि उनके योगदान में मुंबई का वह सभागार और प्रांगण भी शामिल है जिसका नाम उन्होंने पिता की नाटक कंपनी के नाम पर पृथ्वी थियेटर रखा.

महज छह साल की उम्र में शशि कपूर ने 1940 के दशक में मंच पर कदम रखा और अनेक फिल्मों में बाल कलाकार के रूप में काम किया. बीस साल की आयु में उन्होंने लंदन की थियेटर अदाकारा जेनीफर केंडल से शादी कर ली. शशि कपूर के लिए थियेटर हमेशा पहला प्यार रहा और जब तक सेहत ने साथ दिया, वे पृथ्वी थियेटर बतौर दर्शक आते रहे. यह भी दिलचस्प है कि थियेटर ने ही उन्हें जेनीफर के रूप में पहला और आखिरी प्यार दिया. इन दोनों ने पांच नवंबर, 1978 को पृथ्वी थियेटर की स्थापना कर अपने प्यार और समर्पण की एक मिसाल खड़ी कर दी. संयोग देखिये, जब ये दोनों पहली दफा 1956 में कोलकाता में मिले, तो दोनों अपने-अपने पिता की थियेटर कंपनी में अदाकारी कर रहे थे. उसी शहर में 1938 की 18 मार्च को शशि कपूर का जन्म हुआ था.

signed_photo_of_indian_actor_shashi_kapoor_28229उनके बड़े भाईयों- राज कपूर और शम्मी कपूर- के स्टारडम और सफलता की तुलना शशि कपूर से की जाती है, तो अक्सर दीवार (यश चोपड़ा, 1975) में उनकी भूमिका का हवाला दिया जाता है कि वे जैसे फिल्म में अमिताभ बच्चन के किरदार की तुलना में कुछ दबे और नरम रहे, उसी तरह से उनका फिल्मी करियर भी रहा. लेकिन अगर अपने नजरिये को थोड़ा विस्तार दिया जाये, और अगर फिल्मों से ही किरदार निकाल कर शशि कपूर के करियर का हिसाब लगाना है, तो दीवार से दस साल पहले यश चोपड़ा द्वारा ही निर्देशित वक्त को भी ले लिया जाये. दोनों फिल्मों में शशि छोटे भाई हैं और उनके किरदार के लिए उसूल और जिम्मेदारी सबसे ज्यादा मायने रखती हैं. और, ये उसूल और जिम्मेदारियां कोई बड़े-बड़े आदर्शों तथा सामान्य जीवन के हिसाब-किताब से बाहर नहीं हैं. मां का ख्याल रखना है, नौकरी को ठीक से निभाना है, साधारण जीवन से संतुष्ट रहना है और बिना किसी बेजा शोर-शराबे के जीना है. यही मिजाज उनकी असल जिंदगी में साफ-साफ झलकता है.

शादी की, तो कमाई करनी थी. सो, सिनेमा में आ गये. खूब काम किया, अच्छा पैसा और नाम कमाया. इतना काम किया कि अपने बड़ों भाईयों से कहीं अधिक 61 फिल्मों में अकेले नायक बने. अपने समय के सभी नामचीन अभिनेताओं और अभिनेत्रियों के साथ काम किया. उनके दोस्ताना और नरम शख्सियत का पता इस बात से भी चलता है कि उन्होंने अनेक निर्माताओं, निर्देशकों और कलाकारों के साथ बार-बार काम किया. उनके करियर में कोई नकारात्मक गॉसिप या स्कैंडल नहीं है. सिनेमा की उस ग्लैमरस दुनिया के सबसे ग्लैमरस परिवार का सबसे ग्लैमरस आदमी अपने दामन को हर दाग से बचा ले गया. यह किसी कमाल से कम नहीं है.

शोहरत और कामयाबी की बुलंदी पर खड़े उस शख्स के मन में उसके भीतर का कलाकार और कला पारखी व्यावसायिक सिनेमा से ऊब रहा था. इस ऊब को जब उन्होंने जेनीफर से साझा किया, तो उन्होंने कहा कि जो मन में आये, वह कर गुजरो. जिस साल पृथ्वी थियेटर वजूद में आया, उसी साल शशि और जेनीफर कपूर की प्रोडक्शन कंपनी फिल्मवाला भी बनी. तब तक वे हिंदी सिनेमा के बड़े स्टारों में शुमार तो हो ही चुके थे, इस्माइल मर्चेंट और जेम्स आइवरी की फिल्मों के जरिये विदेशों में भी चर्चित थे. शशि कपूर हमारी व्यावसायिक फिल्मों का पहला नाम हैं जिन्होंने कई विदेशी फिल्मों में काम किया और अपनी प्रतिभा दिखायी. बतौर निर्माता उन्होंने जुनून (1978), कलयुग (1981), 36 चौरंगी लेन (1981), विजेता (1982) और उत्सव (1984) जैसी फिल्में बनायीं, जो अपने रिलीज के समय भले ही नहीं चल पायीं, परंतु आज बेहतरीन फिल्मों की फेहरिस्त में अपना स्थान रखती हैं. श्याम बेनेगल, गिरीश कर्नाड, गोविन्द निहलाणी और अपर्णा सेन जैसे निर्देशकों के लिए निर्माता शशि कपूर ने दोनों हाथ से पैसे खर्च किये. कहा जाता है कि हिंदी फिल्मों में जो उनकी फीस होती थी, उससे बहुत कम पैसे पर वे मचेंट-आइवरी फिल्मों में काम करते थे.

शशि कपूर को याद करना महज एक फिल्मी स्टार या शानदार अभिनेता या फिर कला के समर्पित व्यक्ति को याद करना भर नहीं है. उन्हें याद करना अपने सिनेमाई इतिहास के उन अध्यायों को याद करना भी है, जिनमें सिनेमा को प्रतिष्ठित और समृद्ध करने के संघर्ष की कहानियां हैं, जहां फिल्मी कलाकार के लिए रंगमंच के अभिनय की नींव जरूरी होने के संदेश लिखे हैं, और जहां यह लिखा हुआ है कि पैदाइश से बड़ा बनना संयोग की बात है, पर मूल्यों, मर्यादा और मेहनत के साथ बड़प्पन की इबारत लिखना असल में जीवन जीना है.

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