गुरुदत्तः एक बेमिसाल फिल्मकार

भारतीय सिनेमा के इतिहास की बेहतरीन फिल्मों की किसी भी फेहरिश्त में प्यासा (1957), कागज के फूल (1959) और साहिब, बीबी और गुलाम (1962) का नाम जरूर होगा. इनमें से पहली दो फिल्मों के निर्माता-निर्देशक  गुरु दत्त थे. तीसरी फिल्म का निर्माण उन्होंने किया था और निर्देशन अबरार अल्वी का था जिन्होंने गुरु दत्त की तकरीबन तमाम फिल्मों के पटकथा और संवाद लिखे थे. गुरु दत्त की फिल्में हमारे सिनेमा के सुनहरे दौर की शानदार अमानत हैं जो आज भी दर्शकों को आकर्षित करती हैं तथा फिल्मों के अध्येताओं को चमत्कृत करती हैं. गुरु दत्त को उस दौर यानी 1950-60 के काल के चार महान फिल्मकारों में गिना जाता है जिनमें अन्य तीन नाम थे- महबूब खान, बिमल रॉय और राज कपूर. फिल्म निर्माण, निर्देशन, कथानक, शिल्प और सौंदर्य जैसे विविध क्षेत्रों में इन विभूतियों ने महती योगदान दिया और सिनेमा का भव्य विस्तार किया.

gurudutt

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि उनकी फिल्मों को फिल्म उद्योग, साथी कलाकारों और तकनीशियनों, दर्शकों तथा समीक्षकों से पूरा मान मिलने के बावजूद जीते-जी गुरु दत्त को वह प्रतिष्ठा नहीं मिल सकी, जिसके वे हकदार थे. उनके असमय चले जाने के बाद देश-विदेश में उनकी फिल्मों को उत्कृष्ट कलाकृतियों के रूप में स्वीकार किया गया. उनके जीवन-काल में उनके महत्व को रेखांकित नहीं किये जाने का सबसे बड़ा उदाहरण 1963 में लंदन और न्यूयॉर्क में छपी एरिक बरनौ और एस कृष्णास्वामी की महत्वपूर्ण किताब ‘इंडियन फिल्म’ में उनक जिक्र तक नहीं है. यह किताब भारतीय सिनेमा के इतिहास पर पहली उल्लेखनीय रचना है. बहरहाल, कुछ देर से ही सही, गुरु दत्त का नाम महत्वपूर्ण फिल्मकारों में शामिल हुआ.

वर्ष 1925 की नौ जुलाई को गुरु दत्त का जन्म बंगलुरु में एक कोंकणी परिवार में हुआ था और महज 39 साल की उम्र में वे 10 अक्टूबर, 1964 को मुंबई में दुनिया को अलविदा कह गये. उनका पूरा नाम वसंत कुमार शिवशंकर पादुकोणे था. उनके बचपन का बड़ा हिस्सा कोलकाता में बीता था और यहीं उन्हें गुरु दत्त नाम भी मिला था. वहां कुछ दिन उन्होंने बतौर टेलीफोन ऑपरेटर भी काम किया, पर वहां मन नहीं रमा. सिनेमा के आंगन में आने से पहले वे प्रतिष्ठित कलाकार उदय शंकर की अलमोड़ा स्थित नृत्य अकादमी से जुड़े थे. कुछ समय बाद वे 1944 में अपने माता-पिता के पास मुंबई चले आये. उसी साल उन्होंने पुणे के प्रभात फिल्म कंपनी में नृत्य निर्देशक के रूप में काम करना शुरू किया. तीन सालों के पुणे प्रवास में उन्होंने अभिनेता और सहायक निर्देशक के रूप में भी काम किया. यहीं उनकी दोस्ती अभिनेता देव आनंद और रहमान से हुई जो जल्दी ही कामयाब अभिनेता के रूप में स्थापित होनेवाले थे. इस दोस्ती का बड़ा लाभ गुरु दत्त को मिला. गुरुदत्त द्वारा निर्देशित पहली फिल्म बाजी (1951) के नायक देव आनंद थे और इसका निर्माण उनकी पारिवारिक फिल्म कंपनी नवकेतन ने किया था. बाजी के गाने की रिकॉर्डिंग के समय उनकी मुलाकात गायिका गीता दत्त से हुई जो तब बहुत मशहूर हुआ करती थीं. दो सालों के बाद दोनों परिणय-सूत्र में बंध गये.

अपनी पहली फिल्म बाजी के साथ ही गुरु दत्त ने दो महत्वपूर्ण प्रयोग किये. परदे पर उस जमाने के बंबई के अपराध जगत की भीतरी हलचल को पहली बार उकेरा गया तथा हॉलीवुड के फिल्म नोवा स्टाइल की तर्ज पर अंधेरे-उजाले का दिलकश चित्रण हुआ. इस फिल्म में क्लोज अप के लिए उन्होंने 100 मिलीमीटर लेंस का इस्तेमाल कर अद्भुत साहस का परिचय दिया. शिल्प का यह अंदाज उनकी फिल्मों का खास अंदाज बन गया और आज इसे ‘गुरु दत्त शॉट’ के नाम से जान जाता है. गानों के फिल्मांकन का भी उन्होंने नया शास्त्र रचा, जहां कैमरा खुद दृश्य का हिस्सा प्रतीत होता था.

फिल्मकार श्याम बेनेगल ने कहा है कि उनके बाद के फिल्मकारों पर गानों के चित्रण के उनके स्टाइल का बहुत प्रभाव पड़ा है. उनकी फिल्मों के कैनवास पर जहां उनके नृत्य प्रशिक्षण और मंच की समझ तथा प्रभात फिल्म कंपनी के अनुभव की उत्कृष्टता के दर्शन होते हैं, वहीं उनकी शुरुआती फिल्मों में उन फिल्मकारों की विशिष्टताओं का असर भी दिखता है जिनके साथ उन्होंने काम किया था. क्लासिक मनोरंजक फिल्मों में गिने जानेवाली आर पार (1954), मिस्टर एंड मिसेज 55 (1955) तथा सीआइडी (राज खोसला, 1956) में संतोषी, अमिया चक्रबर्ती और ज्ञान मुखर्जी जैसे निर्देशकों की छाप दिखती है. इन फिल्मों में संतुलित डिजाइन, भव्यता और दृश्यों की व्यापकता को देखा जा सकता है जो उनके ठोस पेशेवर प्रशिक्षण का सबूत हैं. इसके साथ ही पटकथा की कसावट और उसमें रची-बसी जीवंतता का स्वाद भी उल्लेखनीय है.

यह भी तथ्य महत्वपूर्ण है कि अबरार अल्वी जहां बतौर लेखक उनकी लगभग सभी फिल्मों से जुड़े थे, तो कैमरामैन वीके मूर्ति भी हर फिल्म में साथ रहे. यही बात गीतकार साहिर लुधायनवी और संगीतकार सचिन देव बर्मन के साथ भी रही.

वर्ष 1957 में आयी प्यासा से गुरु दत्त के अंदाज और तेवर में उल्लेखनीय बदलाव हुआ और वे मनोरंजन से कुछ विमुख होते हुए कलात्मक और दार्शनिक की अवसादपूर्ण अभिव्यक्ति की ओर मुड़े. हालांकि इसके चिन्ह उनकी पूर्ववर्ती फिल्मों में भी पढ़े जा सकते हैं, पर वे उतने गहरे नहीं हैं. अब उनका नायक जीवन की मुश्किलों से नहीं, बल्कि उन सवालों से उलझने लगा था जिनकी वजह से वे पैदा होती हैं. नायक और परिदृश्य अपने माहौल और व्यवस्था के प्रति कटुता से भरने लगे. नायक आलोचनात्मक ही नहीं होता, वह विरोधी और नकारात्मक होने लगता है, वह आस-पास से अपने को बहिष्कृत पाने लगता है, उसकी आकांक्षाओं में मृत्युबोध से भरा नैराश्य घर करने लगता है. वह पूछने लगता है- ये इंसां की दुश्मन समाजों की दुनिया, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है. वह कहता है- वक्त ने किया क्या हसीं सितम, हम रहे न हम, तुम रहे न तुम.  

gurudutt_filmगुरु दत्त की मौत और उनके अवसाद और उनकी फिल्मों की तल्खी को उनके निजी जीवन की हलचलों से भी जोड़ कर देखा जाता है. फिल्मी दुनिया की चकाचौंध से वे पहले से ही कट कर रहा करते थे तथा उनके मिलने-जुलने का सिलसिला सीमित होता था. धन-संपत्ति, प्रेम, परिवार, प्रतिष्ठा जैसी चीजों के मामले में गुरुदत्त बहुत संपन्न थे, लेकिन उनके स्वाभाव में चिड़चिड़ापन, गुस्सा और चिढ़ भी शामिल थे. दिलो-दिमाग की कलात्मक पेचीदगियों के साथ-साथ एक साथी कलाकार के प्रति आकर्षण ने शादीशुदा जीवन में तनाव भर दिया. कागज के फूल की असफलता ने उनके अवसाद को और भी सघन कर दिया. इन उतार-चढ़ावों ने शराब की लत को हद से अधिक बढ़ा दिया. नींद के लिए गोलियां जरूरी हो गयी थीं. हालांकि संभलने-संभालने की भी खूब कोशिशें होती रहीं और वे नाकाम भी नहीं थीं. साहिब, बीबी और गुलाम तथा चौदहवीं का चांद (एम सादिक, 1960) में उन्हें देखा जा सकता है. इनमें वापसी करने तथा अपने सिनेमा के स्वर को कुछ मद्धम करने के सफल प्रयास स्पष्ट हैं.

बहरहाल, गुरु दत्त को यूं ही जाना था. प्यासा की कथा को एक इतिहास मिलना था. वे हमारे लिए विरासत के रूप शानदार फिल्में छोड़ गए हैं जिन्हें बार-बार देखा, सराहा और पढ़ा जा सकता है. नेहरू युग के आशावाद की चमक के बीच व्यक्ति, समाज और शासन के अंधेरे कोने तक ले जानेवाली उनकी फिल्में उस दौर के हकीकत को छूने का भी बहाना बनती हैं. आजादी के बाद के पहले दशक के भरोसे और उस भरोसे में पड़ती दरार को राज कपूर के साथ गुरु दत्त ने सिनेमा के रूप में बखूबी दर्ज किया है. आज जब सिनेमा महज सतही मनोरंजन और मुनाफाखोरी का तरीका बन गया है, उसे कला और अभिव्यक्ति के रूप में स्थापित करने की हर कोशिश में गुरु दत्त और उनकी फिल्में हमें उत्साहित करती रहेंगी.  

(यथावत के जुलाई, 2016 अंक में प्रकाशित)

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s