atticus पर दो शब्द

शुरूआत एक आम बात से. तमाम ख़ूबियों और ख़ामियों के साथ सोशल मीडिया आज हमारे जीवन का ख़ास हिस्सा बन गया है. यह आभासी दुनिया हमारी असली दुनिया का एक ज़रूरी ठीहा बन चुका है. यहाँ सूचनाएँ हैं, तो भटकाव भी, जान-पहचान भी बनते रहे, बारहा टूटे भी, चाहतें भी परवान चढ़ीं, कुछ की नज़रों से गिरे भी… बहरहाल, खीझ के भी यहीं बने रहते हैं. कभी-कभार तो कुछ ऐसा हो जाता है कि वह एब्सर्ड या अहा! के दायरे में भी नहीं अँट पाता. शनिवार का दिन भी कुछ ऐसा ही रहा. उस बाबत अगर कुछ कह-सुन न लूँ, तो चैन भी नहीं पड़ना.

सुबह पुराने मित्र रामानंद की वॉल पर यह पोस्ट लिखा देखा-
‘I don’t believe in magic.’
The young boy said.
The old man smiled.
‘You will, when you see her.’

मैंने तुरंत पूछा कि ये कहाँ से लिया. उन्होंने बताया कि किसी एटिकस/Atticus नाम के कवि का है और वे उसके बारे में अभी इंटरनेट पर पढ़ने का प्रयास कर रहे हैं. इसी बीच उन्होंने इस कवि की कुछ और रचनाएँ भी पोस्ट कीं जिनमें से कुछ को मैंने भी साझा किया. ये कविताएँ शायद स्थापित मानदंडों पर भले ख़ास न ठहरें, पर उनका आकर्षण ज़रूर ख़ास है. पहली ही फ़ुरसत में इस कवि की खोज करने लगा. इंटरनेट पर कुछ सर्च करने का अपना ही मज़ा है. खोजो कुछ, मिल जायेगा बहुत कुछ. जो खोजे, वह छोड़ कुछ और पढ़ने-देखने लगो. ख़ैर इस अज्ञात कुल-शील कवि के बारे में बातें पता चलीं और इन बातों से उन्हें और जानने-पढ़ने की उत्सुकता भी बढ़ी.Screen Shot 2017-05-28 at 7.53.07 AM
एटिकस के बारे में आगे बात करने से पहले मेरे सर्च के नतीज़ों के बारे में कहना चाहूँगा क्योंकि वे भी इस अनुभव का भाग हैं. सबसे पहले तो इस नाम के एक बहुत प्राचीन यूनानी दार्शनिक का पता चला. मुझे लगता है कि हमारे इस कवि ने उन्हीं से अपना नाम पाया होगा. दूसरे एटिकस मिले हार्पर ली के क्लासिक उपन्यास To Kill a Mockingbird के नायक के रूप में- एटिकस फ़िंच. अगर आपने अभी तक यह किताब नहीं पढ़ी है, तो पढ़ लीजिये. सर्च से यह बात भी पता चली कि जब 1960 में यह किताब आयी, तो लोगों ने अपने बच्चों के नाम एटिकस रखना शुरू कर दिया था. बहुत संभव है कि हमारे इस कवि का यह असली नाम हो और उनके माता-पिता ने दिया हो.

ख़ैर, यह भी हुआ कि जब हार्पर ली का एक उपन्यास Go Set a Watchman दो साल पहले आया और एटिकस भी एक चरित्र के रूप में नमूदार हुए, पर इसमें यह बताया गया कि वे नस्लभेदी रूझान रखते थे और आतातायी कू क्लुक्स क्लैन की सभाओं में शिरकत कर चुके थे. अख़बारों ने लिखा कि अब कोई अभिभावक अपने बच्चे का नाम एटिकस नहीं रखेगा. मुझे यह भी लगता है कि हमारे एटिकस ने इन्हीं दिनों कविताई की राह ली होगी.

अब आते हैं अपने एटिकस पर. एटिकस इंस्टाग्राम पर चंद शब्दों में अपनी बात कहते हैं सफ़ेद बैकग्राउंड पर टाइप कर. उनके बेशुमार पोस्टों के हज़ारों प्रशंसक हैं. पर, उनकी फ़ोटो या उनका कोई परिचय मौज़ूद नहीं है. वे सोशल मीडिया के बांक्सी हैं. वे दीवारों पर गुपचुप उकेरे चित्रों के ज़रिये अपना बयान करते हैं, तो एटिकस लफ़्ज़ों का सहारा लेते हैं. मिजाज़ में दोनों रूमानी हैं. एक बेहतर और प्यारी दुनिया की ख़्वाहिश में रचे जा रहे हैं. एटिकस लिखते हैं-
It could be today
the day you realize
they have no
more power over you.

एक पोस्ट में कहते हैं-
brushing a girl’s hair over her ear
once a day,
will solve more problems
than all those therapists
and drugs.

TeenVogue ने मार्च में एटिकस पर एक लंबा फ़ीचर किया जिसमें कवि ने अज्ञात रहने के कारणों और अपनी कविताई पर बातचीत की है. वे कहते हैं कि उनकी कविता ‘इस सच को बाहर ला सकती है कि हम सभी अपनी-अपनी तरह से टूटे हुए लोग हैं, परंतु इसका यह मतलब कतई नहीं है कि हम सुंदर लोग नहीं हैं.’ उनका पहला काव्य-संग्रह Love Her Wild जुलाई में प्रकाशित हो रहा है. उनके इंस्टाग्राम को फ़ॉलो करें और TeenVogue के इंटरव्यू को पढ़ें. उन बातों को दुहराने का कोई मतलब नहीं है.

उनकी बातें उनकी काव्यात्मक अभिव्यक्तियों की तरह ही आकर्षक हैं. एटिकस हमारे समय में कुछ अच्छा बचे रह जाने को रेखांकित करनेवाला दार्शनिक मालूम पड़ता है. हाँ, काव्य के मर्मज्ञ ज़रूर निराश हो सकते हैं. कोई भी रचना अपने परिवेश से अलहदा आस्तित्व नहीं रखती है. कोई भले दावा करे अकेलेपन में कुछ रच-कह लेने की, पर ऐसा होता नहीं है.

आज की युवा पीढ़ी का बड़ा हिस्सा थोथे अकेलेपन का दावा करता है, पर वह परजीविता का मारा हुआ है. वह अपनी सोच में बेहूदा नकलची है. वह अपने भ्रम का बीमार है. इधर-उधर की दार्शनिकताएँ और व्याख्याएँ सोशल मीडिया पर चेंप कर यूनिक़ बनना गहरे मानसिक असंतुलन का संकेत है. ऐसे में उसी पीढ़ी के एटिकस जैसे कवि या रचनाकार या संवेदनशील जब अपने और दुनिया के बीच के पुल पर धीमी आवाज़ में गुनगुनाते हैं, तो वह एक बड़ी अनुगूँज बन जाती है, सुगंध की तरह हर तरफ़ पसर जाती है.

एटिकस को पढ़ना ख़ुद को छूना है और दूसरे को महसूस करना है. दुई और बहु में स्व की सोंधी महक मिलाना है. यह मिजाज़ इसी दौर में हो सकता था, इन कविताओं को सोशल मीडिया पर ही लिखा और पढ़ा जाना था. अपने बिखराव को ऐसे ही समेटना और बचे हुए को इसी तरह सँभालना था. इस तरह के इंस्टाग्राम कवियों पर The Guardian में पिछले साल फ़रवरी में मिशेल डीन ने शानदार टिप्पणी की थी. उसे भी पढ़ा जाना चाहिए. पर, सबसे पहले एटिकस को पढ़ा जाये-
Ill let you into
my soul
but wipe your feet at the door.

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