1950 के दशक के पॉपुलर मेलोड्रामा और नेहरूवियन राजनीति

1950 का दशक हिंदुस्तानी सिनेमा का स्वर्णिम दशक माना जाता है. इसी दौरान इस सिनेमा की व्यावसायिकता, कलात्मकता और नियमन को लेकर आधारभूत समझदारी भी बनी जिसने आजतक भारतीय सिनेमा को संचालित किया है. यही कारण है कि सौ साल के इतिहास को खंगालते समय इस दशक में बार-बार लौटना पड़ता है. इस आलेख में इस अवधि में बनी फिल्मों और उनके नेहरूवियन राजनीति से अंतर्संबंधों की पड़ताल की गई है.

 

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photo: filmfare

अक्सर यह कहा जाता है कि 1950 के दशक की पॉपुलर फिल्मों ने तब के भारत की वास्तविकताओं की सही तस्वीर नहीं दिखाई क्योंकि तब फिल्म उद्योग जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में बनी नई सरकार द्वारा गढ़ी गईं और गढ़ी जा रहीं राष्ट्रवादी मिथकों को परदे पर उतारने में लगा हुआ था. फिल्मों के व्यापक महत्व को समझते हुए नई सरकार ने कई संस्थाएँ स्थापित कीं और बड़े पैमाने पर दिशा-निर्देश जारी किये थे. वर्ष 1951 में फिल्म इन्क्वायरी कमिटी ने फिल्म उद्योग से आह्वान किया कि वह राष्ट्र-निर्माण में अपना योगदान दे और सरकार को मजबूत करे. इस रिपोर्ट में सरकार ने उम्मीद जताई कि हिंदुस्तानी सिनेमा ‘राष्ट्रीय संस्कृति, शिक्षा और स्वस्थ मनोरंजन’ को केंद्र में रखकर काम करेगा जिससे ‘एक बहुआयामीय राष्ट्रीय चरित्र’ का निर्माण हो सके. सरकार ने सिनेमा को नियंत्रित करने के लिए आर्थिक नियंत्रण और सेंसरशिप का भी सहारा लिया. लंबे समय तक सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहे बीवी केसकर ने तो आकाशवाणी पर फिल्मों गीतों के प्रसारण को ही प्रतिबंधित कर दिया था.

इस लेख में उस दौर की कुछ प्रतिनिधि फिल्मों- श्री 420 (राज कपूर, 1955), आवारा (राज कपूर, 1951), दो बीघा जमीन (बिमल रॉय, 1953), प्यासा (गुरुदत्त, 1957), मदर इण्डिया (महबूब खान, 1957)  और नया दौर (बीआर चोपड़ा, 1957)- के माध्यम से यह रेखांकित करने की कोशिश की गई है कि तमाम नियंत्रणों और नियमन के बावजूद तत्कालीन हिन्दुस्तानी सिनेमा ने नेहरू युग का चित्रण बड़ी परिपक्वता के साथ किया. इनमें से कुछ फिल्में राज्य के राष्ट्रवादी चिंतन को स्पष्ट रूप से समर्थन करती हैं, वहीं कुछ उसकी जोरदार आलोचना करती हैं. फिल्मों पर बात करने से पहले नेहरू युग के महत्वपूर्ण आयामों को चिन्हित करना आवश्यक है.

नेहरू युग, जिसे ‘आशा का युग’ भी कहा जाता है, की आधारभूत समझदारी उनकी किताब ‘डिस्कवरी ऑव इण्डिया’ से निकलती है जिसमें आधुनिक राष्ट्रवाद के दौर में परंपरा की पुनर्व्याख्या की कोशिश की गयी है. किताब का दावा है कि भारतीय सभ्यता श्रेष्ठ है और उसमें हजारों साल से चली आ रही अन्तर्निहित निरंतरता है, तथा व्यापक वैविध्य के बावजूद ‘एकता का कोई स्वप्न सभ्यता के प्रारम्भ से भारतीय मष्तिस्क में उपस्थित है’. पार्था चटर्जी के अनुसार, नेहरू के नेतृत्व में राष्ट्रवाद की जो विचारधारात्मक पुनर्रचना की गयी, वह ‘एक ऐसी विचारधारा है जिसका केंद्रीय संगठनात्मक सिद्धांत राज्य की स्वायत्तता है और इसे वैधानिक बनाने वाला सिद्धांत सामाजिक न्याय की अवधारणा है’. इस विचारधारा को लागू करने के लिए ऐसे संस्थानों की आवश्यकता थी जो ‘विकास की भावना, जो कि आधुनिकता का पर्यायवाची है’ को अंगीकार करते हों. नेहरू के लिए आधुनिकता का मूल-मंत्र ‘वैज्ञानिक सोच’ थी जिसका मूर्त रूप वे ‘भारी उद्योग-तंत्र’ में देखते थे. हालांकि 1950 के दशक के आखिरी वर्षों में उनके विचारों में परिवर्तन हुआ और वे कृषि तथा लघु और कुटीर उद्योगों पर पर्याप्त ध्यान देने के महत्व को समझने लगे थे, लेकिन तब तक उनकी योजनाएं और नीतियां भारतीय जीवन पर हावी हो चुकी थीं. नेहरू योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए राज्य द्वारा बल-प्रयोग के हामी थे.

सुनील खिलनानी की स्थापना है कि नेहरू के शासन की असली उपलब्धि यह थी कि उन्होंने भारतीय समाज के केंद्र में राज्य की सत्ता को अधिष्ठित कर दिया. जीवन के हर क्षेत्र- रोजगार, राशन, शिक्षा, सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान- में राज्य ने अपने उत्तरदायित्व का दावा कर दिया था. भारतीय चेतना में राज्य जिस गहरी तक पैठ चुका था, वहां इससे पहले कोई और राजनीतिक एजेंसी नहीं पहुंच सकी थी. भाखरा-नांगल बांध सरीखे ‘आधुनिक पूजा-स्थल’ देश के मानचित्र पर तेजी से उभरने लगे थे. देश लोहे और सीमेंट के प्यार की गिरफ्त में था.

नेहरू के नेतृत्व में भारतीय समाज को बदल देने की राष्ट्रवादी राज्य की महत्वकांक्षा का स्क्रिप्ट शहरों में तैयार हुआ और यहां से गांव-कस्बों में ले जाया गया. इस आधुनिकता ने हिन्दुस्तान और उसके बाशिंदों को जटिलताओं और विरोधाभासों के अखाड़े में धकेल दिया. खिलनानी रेखांकित करते हैं कि आधुनिक विश्व के सभी प्रलोभन शहरों में केंद्रित हैं, लेकिन यहीं पर अनेक हिन्दुस्तानियों ने इस आधुनिकता की मृग-मरीचिका को भी समझा. इन अनुभवों ने भरोसों को झिंझोड़ा, नई राजनीति को पैदा किया, और ये शहर भारतीय लोकतंत्र के विरुद्धों के रंगमंच बने. इन शहरों में ‘भारत’ की समझदारी को लेकर नए विवाद हुए और नई परिभाषाएं गढ़ी गयीं.

शहरों के इस बदलते माहौल ने फिल्मकारों को जटिल कथानकों की ओर आकृष्ट किया जिन्हें मेलोड्रामा और सामाजिक फिल्म शैली में परदे पर उतारा जा सके. यह महज कहीं पीछे छूट गई सीधी-सादी जीवन-शैली के लिए ललक नहीं थी, बल्कि यह खो गई निर्दोषता की तलाश थी और राष्ट्र-निर्माण के वृहत उत्सव में एक कला-रूप द्वारा अपनी जगह तलाशने और बनाने की जिद्द भी थी. उल्लेखनीय है कि श्री 420 में बेतरतीब कपड़े पहने एक बेघरबार नायक उस नेहरू की राजनीति को प्रतिनिधित्व देता है जो सुरुचि-पूर्ण कपड़े पहनता है. नायक गाता है-shree420

निकल पड़े हैं खुली सड़क पर अपना सीना ताने
हैं मंजिल कहां, कहां रूकना है, ऊपरवाला जाने
नादान हैं जो बैठ किनारे पूछें राह वतन की
चलना जीवन की कहानी
रुकना मौत की निशानी

इस गीत में आजादी की आधी रात को दिए गए नेहरू के प्रसिद्ध ‘नियति के साथ करार’ भाषण की गूंज सुनाई देती है जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘क्या हममें इतना साहस है कि हम इस अवसर को थामें और भविष्य की चुनौतियों को स्वीकार करें!’. फिल्म के शुरू में ही शहर को लेकर बनी समझदारी को उस मील के पत्थर के माध्यम से दिखाया गया है जिस पर शहर- बंबई- की दूरी 420 किलोमीटर अंकित है. भारतीय दंड-संहिता में यह उस धारा की संख्या है जिसके अंतर्गत धोखाधड़ी और जालसाजी जैसे अपराध आते हैं. शहर को धूर्तता से भरी जगह होने की लोकमानस की आम समझ से ही यह फिल्म शुरू होती है. शहर से नायक राजू का पहला परिचय उसकी भागती-दौड़ती जीवन-शैली से होता है. अराजक शहर को देखकर विस्मित राजू खुद से कहता है- क्या बंबई में रहनेवाले सभी बहरे हैं. बंबई से परिचय के प्रारंभिक क्षण दिखाते हैं कि राजू की कस्बाई निर्दोषता शहरी संस्कृति से बेमेल है.

ऐसा प्रतीत होता है कि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का केंद्र रहे शहर इलाहाबाद के राजू के लिए देश की आर्थिक राजधानी बंबई एक ऐसा स्थान है जहां उसके लिए जगह नहीं है. राजू के पास बैठा भिखारी सीधे-सीधे कहता है- ये अंधे-बहरे पैसे के अलावा कुछ और नहीं देखते. यहाँ इमारतें कंक्रीट की बनी हैं और दिल पत्थर के. इस शहर में बचे रहने की लड़ाई की इस कहानी में फिल्म लगातार नैतिकता और अच्छाई का पक्ष लेती चलती है. महानगर निरंतर विलगाव पैदा करता है, लेकिन नायक अपनी संवेदनशीलता खोये बिना वहीं रहने की ज़िद्द धरे हुए है. फिर वहां विस्थापित बेघर मजदूर हैं जो नायक को पनाह देते हैं. एक जैसे मुश्किलों के आधार पर यह सहभागिता बनती है. यह सहभागिता उस छूट गए अंचल की एका से मजबूत होती है जो लाक्षणिक रूप में यूँ बयान होती है- ‘गंगा माई के बच्चे सब भाई-भाई हैं’. शहर के हाशिये उस फूटपाथ की बूढ़ी महिला का नाम गंगा है जो उस समूह की ‘माँ’ है. इस नाम से दो तत्व सांकेतिक होते हैं: एक, वह ‘देस’ जो मूल निवास है- संयुक्त प्रांत, और दूसरा, साझी संस्कृति. यह उस अथाह अंधेरे में पवित्रता की तलाश भी है. ये लोग ‘भूखे-नंगों का राज’ का सपना देखते हैं. राजू यानि राज का फूटपाथ पर आना एक नई उम्मीद का संकेत है. दिल का हाल सुने दिलवाला गीत शहर को उसके हाशिये से देखने की कोशिश है और उसके विरुद्ध आरोप-पत्र भी.

फिल्म की नायिका का नाम विद्या है जो ‘नैतिक मूल्यों’ की वाहक है. उसके साधारण घर में उसकी मां के चित्र के अतिरिक्त दो और चित्र हैं- नेहरू और विवेकानंद के. इस नए राष्ट्र के ये ‘मानक आदर्श’ हैं जिनका अनुसरण जनता को करना है. इसके विपरीत जो महिला चरित्र है, उसका नाम माया है जो ‘धन-लोलुप’ है और पाश्चात्य संस्कृति के ‘विकृत मूल्यों’ से प्रभावित है. लेकिन फिल्म संस्कृति और संस्कारों का अंधा समर्थन नहीं करती. फिल्म में जो चरित्र ‘स्वदेशी, धर्म, संस्कृति, मन की शांति, आत्मा और देश’ की दुहाई देता है, वह एक बेईमान नेता और व्यवसायी है. उसके उलट राजू हिन्दुस्तानी ‘दिल’ और रोटी की जरूरत की बात करता है. फिल्म में मकान की समस्या शहर की केंद्रीय समस्या है. भ्रष्ट व्यवसायी सस्ते मकान का लालच देकर गरीबों को ठगने की कोशिश करता है. जब उन्हें इस बात का पता चलता है तो वे सहकारी प्रोजेक्ट के आधार पर सामूहिक प्रयास से इस समस्या का निदान ढूंढते हैं. फिल्म उस दृश्य के साथ समाप्त होती है जिसमें एक सुनोयोजित कालोनी है जहां सभी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं. यह फिल्म नेहरू के योजना और सामाजिक न्याय की समझ से प्रेरित है और उन तमाम तत्वों का विरोध करती है जो इसमें बाधक बन रहे थे. लेकिन, यह फिल्म राज्य को भी अधिक मानवीय और संवेदनशील बनाती है.

श्री 420 का बेघरबार विस्थापित नए भारत का अपना दृष्टिकोण लेकर आवारा में भी उपस्थित है. इस फिल्म में भी झुग्गी-झोपड़ी में जी रही जिंदगी का चित्रण है और इसका मानना है कि बुनियादी जरूरतों के पूरा न होने की मजबूरी में ही गरीब को अपराध करने के लिए मजबूर होना पड़ता है. मशहूर आवारा हूं गीत शहर की सड़कों और बाजारों की हलचलों को रेखांकित करती है. इस फिल्म में भी आपराधिक तत्व और पुराने मूल्य खलनायक के बतौर मौजूद हैं. शहर अमीरों और गरीबों के द्वैत में बंटा है. जज रघुनाथ जब अपनी पत्नी को घर से निकाल देते हैं जो फिल्म सीता के मिथक का सहारा लेकर महिलाओं की आम स्थिति को बयान करती है- जुलम सहे भारी जनकदुलारी. कुल मिलाकर यह फिल्म भी नेहरूवियन दृष्टि को भविष्य का रास्ता बताती है.

do-bigha-zaminलेकिन फिल्में नेहरू के विचारों को आलोचनात्मक नजरिये से भी परख रही थीं. बिमल रॉय की दो बीघा जमीन राष्ट्र के विकास के मॉडल और उसके वर्गीय सांठ-गांठ को सामने लाती है. इस फिल्म का केंद्रीय चरित्र कर्ज की रकम चुकाने के लिए रोजगार की तलाश में गांव से शहर- कलकत्ता जाता है. आधुनिकता समृद्धि पैदा करती है- इस अफवाह से प्रभावित नायक शंभू महतो कहता है- कलकत्ता में पैसे हवा में उड़ते हैं. शहर एक बार फिर गांव से आये आदमी के लिए सहज नहीं हैं और रहने की जगह बड़ी समस्या है. यह समस्या गरीबों में एक साझेदारी पैदा करती है. फिल्म यह भी दिखाती है कि सरकारी तंत्र खाली पड़ी जगहों पर गरीबों को बैठने भी नहीं देता. यह दृश्य राज कपूर और गुरुदत्त की फिल्मों में भी दिखता है. पानी को लेकर हो रहे झगड़े के माध्यम से झुग्गी की जिंदगी की मुश्किलों को दिखाया गया है. एक दृश्य में महतो कहता है- पैसे के बिना साँस लेना भी मुश्किल है. गरीबों की दशा को विकलांग मजदूर, बूढ़ा रिक्शावाला, बाल मजदूर आदि के माध्यम से भी रेखांकित करने की कोशिश की गयी है. शहर के वंचित तबकों की जिंदा रहने की लड़ाई को फिल्म दिखाती चली जाती है लेकिन इससे पहले उल्लिखित फिल्मों की तरह कोई ‘नियति के साथ करार’ मॉडल का समाधान नहीं देती. सत्ता तो सत्ता, गजब तेरी दुनिया गीत के माध्यम से गरीब भगवान से नाराजगी दिखाते हैं. इन तीनों फिल्मों में महानगर को ‘परदेस’ और मूल निवास को ‘देस’ की संज्ञा दी गयी है. यह आधुनिकता के विचारधारा से हिन्दुस्तान के बड़े हिस्से की असहजता का द्योतक है.

इस दशक की बड़ी फिल्मों से एक है बीआर चोपड़ा की नया दौर. इसका कथानक पारंपरिक उद्योग और मशीनीकरण के बीच बहसnaya-daur पर केंद्रित है. फिल्म की शुरुआत महात्मा गांधी के एक कथन से होती है जिसमें श्रम की महत्ता की बात कही गयी है. पूरी तरह से गांव में स्थित यह फिल्म शहर के संदर्भों से भरी है. गांव के आर्थिक मुखिया का बेटा शहर से शिक्षित होकर लौटता है और आधुनिकीकरण तथा अधिक लाभ के लिए प्रेरित है. वह शहर से प्रशिक्षित श्रमिक मंगाता है, मशीनें लगता है और बेरोजगार गांव वालों को शहर जाने की सलाह देता है. इस पर नायक कहता है- ‘देसवालों को परदेस भेजना चाहते हो’. शहर से आया पत्रकार वामपंथी रुझान का है जो चीन और रूस की बात करता है. फिल्म मशीनों और पारंपरिक कौशल के बीच संतुलन बनाने के संदेश के साथ खत्म होती है. यह फिल्म जहां नेहरूवादी रुझान के साथ चलती है, वहीं फिल्म का खलनायक नेहरू की भाषा में बोलता है. इसे नेहरू की आलोचना के तौर पर देखा जाना चाहिए क्योंकि उसके पिता गांधी की समझदारी का प्रतिनिधित्व करते हैं. उनकी नजर में गांव के मूल्य पवित्र हैं और वे खुद को ग्रामीण अर्थव्यवस्था के ट्रस्टी के रूप में देखते हैं.

कई जगह नायक शंकर वामपंथी सिद्धांतों से प्रभावित नजर आता है. इन अलग-अलग समझदारियों के बीच संतुलन और सामंजस्य की जरूरत को रेखांकित करते हुए फिल्म पूरी होती है. लेख में पहले ही कहा गया है कि नेहरू 1957 तक खुद अर्थव्यवस्था के सभी घटकों में संतुलन की बात कहने लगे थे और औद्योगिकीकरण को लेकर उनकी जिद्द में कमी आ रही थी. फिल्म धार्मिक अंध श्रद्धा पर भी प्रहार करती है. नायक एक जगह ऊंची जातियों और वर्गों पर गरीबों के शोषण के लिए धर्म और आस्था की आड़ लेने का आरोप भी लगाता है और कहता है- ‘आदमी के रस्ते में भगवान भी आएगा तो मैं रुकूंगा नहीं’.
   
pyaasaदो बीघा जमीन की तरह गुरुदत्त की प्यासा भी स्थिति पर संताप करती है. उस युग के बुरे हालात को फिल्म भूख, बेरोजगारी, वेश्यावृति आदि के माध्यम से दिखाती है और किसी समाधान को सुझाने से बचती है. फिल्म के अंत में नायक और नायिका शहर छोड़ कर किसी अनजान जगह की ओर चल देते हैं. ‘जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहां हैं’ गीत के जरिये नायक गरीबों की दुर्दशा के लिए राज्य और समाज को सीधे-सीधे दोषी ठहराता है. हिन्दुस्तान की महान फिल्मों से एक मानी जानेवाली मदर इण्डिया को नेहरूवियन राजनीति का सिनेमाई अनुवाद कहा जाता है. स्त्री, किसान और विकास के सहारे महाजनी व्यवस्था और शोषण के विरुद्ध हिंसक विद्रोह की आलोचना करती हुई यह फिल्म राज्य और उसके आधुनिक विकास के मॉडल को समाधान के रूप में सामने रखती है. इसी कारण मदर इण्डिया को सिनेमाई ‘भारत की खोज’ भी कह दिया जाता है।

इन फिल्मों पर बात करते हुए हमें मेलोड्रामा को भी ध्यान में रखना चाहिए जहाँ जोरदार भावुकता, नैतिक ध्रुवीकरण, स्पष्ट दुष्टता, संवादों, हाव-भाव और स्थितियों का अतिरेक, अच्छाई की जीत आदि तत्वों की निरंतर मौजूदगी रहती है. अच्छाई और बुराई के साफ ध्रुवीकरण के द्वारा मेलोड्रामा देश और काल के असली शक्तिओं का चित्रण करता है और बुराई से संघर्ष के लिए प्रेरित करता है ताकि सामाजिक-व्यवस्था को बरकरार रखा जा सके. इसी क्रम में गीत-संगीत और अन्य कला-पक्षों का भी ख्याल रखा जाना चाहिए.

यह सही है कि अभी-अभी आजाद हुआ देश नेहरू के जबरदस्त आकर्षण में था और उनके नेतृत्व से उससे बड़ी उम्मीदें थीं. उन्हें उस समय कई तरह की राजनीतिक विचारधाराओं से समर्थन मिल रहा था जो समय-समय पर उनका विरोध भी करते थे. ऐसे में तब की फिल्मों में वामपंथी रुझान के कलाकारों, लेखकों और तकनीशियनों के योगदान को समझना बहुत आवश्यक हो जाता है. नेहरु, जिनके बारे में टैगोर ने कहा था कि वे अपने कामों से कहीं अधिक बड़े और अपने परिवेश से कहीं अधिक सच्चे थे, के व्यक्तित्व और उनके विचारों को तथा हिंदुस्तानी सिनेमा में उसके चित्रण को ठीक से समझने के लिए विस्तार से लिखे और पढ़े जाने की जरूरत है. साथ ही, इन फिल्मों पर कोई अंतिम निर्णय देने से पहले इस माध्यम की सीमाओं और उस समय की पड़ताल भी जरूरी है. अगर हम फिल्मों को उनके संदर्भों और तत्कालीन परिस्थतियों से काटकर देखने की कोशिश करेंगे तो कला के रूप में तथा सामाजिक बदलाव के एक औजार के रूप में इसे कुंद ही करेंगे.

(हंस के फरवरी, २०१३ के अंक में प्रकाशित)

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