छोटी फिल्मों का बड़ा कैनवास

कहानी और कहानी कहने के ढंग की विविधता ही रचनाधर्मिता को समृद्ध बनाती हैं. समाज में भी इस वैविध्य का होना आवश्यक है, अन्यथा उसका संकुचन उसकी सीमा बन सकता है और वह वैचारिक दरिद्रता का शिकार हो सकता है. उदात्त समाज और उदात्त रचनात्मकता एक-दूसरे के पूरक ही नहीं, अपरिहार्य अवयव हैं. कुछ फिल्में इस जरूरत को बारहा जाहिर भी करती रहती हैं और इसे पूरा करने की भरसक कोशिश भी करती रहती हैं. बीते दिनों प्रदर्शित वेटिंग (अनु मेनन) और धनक (नागेश कुकुनूर) ऐसी ही फिल्में हैं.waiting_1

वेटिंग में नसीरुद्दीन शाह और कल्कि कोचलीन मुख्य भूमिकाओं में हैं तथा यह फिल्म एकसमान त्रासदी से घिरे विपरीत स्वभाव के दो लोगों की भावनात्मक हलचल को छूने का प्रयास करती है. उम्रदराज शाह की पत्नी और युवा कल्कि के पति कोमा में हैं. दोनों के ठीक होने की संभावना अत्यंत क्षीण है. मुख्य किरदारों के संवाद और व्यवहार के जरिये उनके अंतर्मन की उथल-पुथल की आहट हम तक पहुंचती है. फिल्म दिलासा नहीं देती, वह त्याग का महाआख्यान भी नहीं रचती. फिल्म की निर्देशिका किरदारों की बेचैनी, छटपटाहट और संतुलन साधने की यात्रा में दर्शकों को सहभागी बनाती है. यही उसकी कामयाबी है. अनु मेनन की यह तीसरी फिल्म है. एक युवा निर्देशिका, जिसकी पहली फिल्में अपने ट्रीटमेंट में वेटिंग से बिल्कुल अलहदा थीं, इस फिल्म में दुख के विभिन्न स्तरों से जिस तरह गुजरती है और हमें गुजारती है, वह कथानक और सिनेमा की विधा पर उसकी निपुणता का परिचायक है. उनकी आनेवाली फिल्मों से हमें ऐसी ही गहनता की उम्मीद बनती है.

dhanak_1नागेश कुकुनूर भारतीय सिनेमा में नव-समांतर स्वतंत्र फिल्मों के चलन के शुरुआती झंडाबरदार हैं. साधारण कहानियों को सिनेमाई किस्सागोई की उनकी अपनी अदा रही है. धनक दो बच्चों की कथा है. बहन अपने दृष्टिबाधित भाई से वादा करती है कि उसके अगले जन्मदिन तक उसकी आंखों को रौशन कर देगी. कृष और हेतल अपनी अभिनय क्षमता से बड़े-बड़े कलाकारों के बराबर साबित होते हैं. वेटिंग जहां महानगरीय वैभव के माहौल में दुख का वृतांत रचती है, वहीं धनक ठेठ मरुस्थल में उम्मीद के पौधे रोपती है. कैमरा कहानी और किरदारों के भाव को क्षण-क्षण सिर्फ कैद ही नहीं करता, बल्कि अपनी गति से उन्हें सघन भी करता है. दोनों फिल्मों में संगीत दर्शकों के अनुभव को गहन करने में अपनी भूमिका निभाता है. दोनों फिल्में अभी सिनेमाघरों में हैं. इन्हें देखा जाना चाहिए. इसी आग्रह के कारण मैं कहानी और ट्रीटमेंट के विस्तार में जाने से परहेज कर रहा हूं. 

इन फिल्मों पर बात करते हुए मैं इनके निर्माण और हम तक पहुंचने की प्रक्रिया के बारे में कुछ कहना जरूरी समझता हूं. बीते एक-डेढ़ दशकों में हिंदी सिनेमा के रंग-ढंग में जो बदलाव दिख रहा है, उसके लिए हमें आर्थिक उदारवाद का आभारी होना चाहिए. फिल्म निर्माण में कॉर्पोरेट और निवेशकों के आने से लागत और कमाई के हिसाब में कुछ पारदर्शिता आयी. मॉल कल्चर के विकास ने मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों को पैदा किया जहां उच्च और मध्य वर्ग के लोग अधिक कीमत पर टिकट खरीदकर फिल्म का आनंद उठा सकते हैं. साथ ही, मीडिया के विस्तार ने प्रचार को सस्ता और आसान बना दिया. इस बदली हुई परिस्थिति का सबसे अधिक फायदा उन निर्देशकों और रचनाकर्मियों को मिला जो लीक से हटकर फिल्में बनाने के लिए बेचैन थे, पर सिनेमाई अर्थशास्त्र उनके अनुरूप न था. मीडिया के विस्तार ने दर्शकों का एक वर्ग भी पैदा कर दिया था जो फार्मूला आधारित आम बम्बईया फिल्मों से ऊब चुका था तथा वह नए कथानक, तेवर और नजरिये की चाह कर रहा था.dhanak_2

आज स्थिति यह है कि अनेक छोटे बजट की फिल्में नाम भी बटोर रही हैं और मुनाफा भी कमा रही हैं. बड़ी कंपनियां सिनेमा में निवेश कर रही हैं और बड़े बैनर छोटी फिल्मों का निर्माण कर रहे हैं. बहरहाल, नयी कहानियों, नयी सोच और नये मिजाज से लबरेज इन फिल्मों की रसाई अब भी बड़े शहरों तक ही महदूद है तथा इंटरनेट पायरेसी के खतरे से भी इन्हीं का सबसे अधिक नुकसान होता है. हालांकि टेलीविजन के रूप में भी इन फिल्मों को एक खिड़की मिली है, पर टेलीविजनी दर्शक और सिनेमाई दर्शक में एक फर्क है. यह सही है कि बहुधा दोनों एक ही हैं या एक जैसे ही हैं, पर सिनेमा हॉल में फिल्म का लगना और चलना तथा वहां दर्शकों की मौजूदगी इस पूरे वातावरण को मदद करती है, ऐसी फिल्मों के विस्तार की जमीन मुहैया कराती है. टेलीविजन फिल्म के ग्रहण करने और उसे उत्साह देने में उतना मददगार नहीं होता.

waiting_3सिनेमा की असली परीक्षा टिकट खिड़की पर ही होती है. मेरे कहने का अर्थ यह नहीं है कि जो फिल्में अधिक कमाई करती हैं, वे अनिवार्य रूप से अच्छी होती हैं, और जो नहीं चलतीं, वे बुरी होती हैं. कुछ हद तक यह पैमाना इस्तेमाल किया जा सकता है. पर, दर्शकों तक फिल्में पहुंचाने और दर्शकों को सिनेमाघरों तक ले आने का भी एक तंत्र है. यह तंत्र प्रचार का है. प्रचार पर आज फिल्म की लागत से कई गुना धन अधिक खर्च किया जा रहा है. चूंकि प्रयोगधर्मी फिल्मों का बजट बहुत कम होता है, उनमें स्टार नहीं होते, ग्लैमर और आम मनोरंजन के तत्वों की अनुपस्थिति होती है, इस कारण उनके विज्ञापन पर अधिक खर्च करने का साहस निर्माता नहीं उठा पाता. इस कारण ऐसी फिल्में कम सिनेमाघरों में लगती हैं, और यदि शुरुआती दिनों में दर्शक नहीं जुटे, तो सिनेमाघर के मालिक और वितरक अधिक इंतजार भी नहीं करते हैं.

इन्हीं कारणों से वेटिंग और धनक को भी दर्शक नहीं मिले. यहां यह भी कहा जाना चाहिए कि यदि बतौर दर्शक हमें अच्छा सिनेमा चाहिए, तो हमें भी अपनी भूमिका निभानी होगी. रचनात्मक समाज को संवेदनशील कलात्मक पहलों को हौसला देना चाहिए. यदि सिनेमा को सिर्फ सतही मनोरंजन, ग्लैमर और मुनाफे के गणित तक सीमित कर दिया जाएगा, तो हमें उन्हीं फिल्मों को भोगने के लिए अभिशप्त रहना होगा, जिनकी बहुतायत की शिकायत हम करते रहते हैं. अच्छे सिनेमा के लिए अच्छे दर्शक जरूरी हैं. क्या बड़े-बुजुर्गों ने हमें यह नहीं बताया है कि हमें उतना ही मिलता है, जितना हममें पात्रता होती है? क्या बेहतर पाने के लिए हमें कुछ और कोशिश करने की जरूरत नहीं है? अच्छी फिल्मों की असफलता हमारे दर्शक होने की क्षमता पर भी प्रश्नचिन्ह है.

यथावत के जुलाई (प्रथम अंक) में प्रकाशित

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