इतिहास के साथ खिलवाड़ करती कथित ऐतिहासिक फिल्में

अगस्त में प्रदर्शित आशुतोष गोवारिकर की मोहेंजो दारो और टीनू सुरेश देसाई की रुस्तम ऐतिहासिक विषयों पर बनी फिल्में है. जहां गोवारिकर हजारों साल पहले की हड़प्पा सभ्यता में अपनी कहानी बुनते हैं, वहीं देसाई आधुनिक भारत में 1950 के दशक की एक बहुचर्चित अपराध कथा को परदे पर चित्रित करते हैं. कथानक, अभिनय और प्रस्तुति को लेकर इन दोनों फिल्मों को जो भी प्रशंसा या आलोचना मिली है, वह तो अलग विषय है, परंतु कथा के कालखंड और इतिहास के साथ समुचित न्याय नहीं करने के लिए दोनों की बड़ी निंदा हुई है.

फिल्मकारों के समर्थन में यह कहा जा सकता है कि चूंकि सिनेमा कलापूर्ण अभिव्यक्ति का एक माध्यम है, अतः फिल्मकार को छूट लेने का अधिकार होना चाहिए. यह सही तर्क है. यह भी समझा जाना चाहिए कि ऐतिहासिक फिल्में उस समय के इतिहास को नहीं, बल्कि उसकी पृष्ठभूमि में एक खास कहानी को हमारे सामने पेश करती हैं. इसलिए प्रस्तुति का स्तर सिनेमा को देखने का मुख्य आधार होना चाहिए. mohenjo-daro

लेकिन ऐसा कहने से इस सवाल का जवाब नहीं मिल जाता है कि ऐतिहासिक फिल्में या इतिहास की बड़ी घटनाओं या किरदारों पर फिल्म बनाने के मामले में भारतीय सिनेमा, खासकर मुंबई से चलनेवाला हिंदी सिनेमा इतना स्तरहीन और पिछड़ा क्यों है. आप एक फिल्म का नाम नहीं बता सकते हैं जो ठोस रूप से इतिहास या किसी महान चरित्र पर आधारित हो. इस मामले में उल्लेखनीय नाम चेतन आनंद की हकीकत (1964) और एस राम शर्मा की शहीद (1965) ही याद आ पाते हैं. बॉर्डर (जेपी दत्ता, 1997) भी एक उम्दा फिल्म थी और उसने एक बटालियन की कहानी बहुत मर्मस्पर्शी ढंग से पेश किया था.

ऐसा तब है जब पौराणिक कथाएं, ऐतिहासिक घटनाएं और लोक में प्रचलित कहानियां प्रारंभ से ही भारतीय सिनेमा की सबसे पसंदीदा विषय रही हैं. पहली हिंदुस्तानी फिल्म राजा हरिश्चंद्र (दादासाहेब फाल्के, 1913), पहली बोलती फिल्म आलमआरा (आर्देशिर ईरानी, 1931), सबसे लोकप्रिय फिल्में मीरा (एलिस आर डुंगन, 1845/47) मुगल-ए-आजम (के आसिफ, 1960), शहीद (एस राम शर्मा, 1965), लगान (आशुतोष गोवारिकर, 2001), बाहुबली (एसएस राजामौली, 2015) आदि इन्हीं श्रेणियों की फिल्में हैं.

मोहेंजो दारो की सबसे बड़ी आलोचना यह हुई कि फिल्मकार ने सिंधु घाटी सभ्यता के ज्ञात तथ्यों की घोर उपेक्षा की है. रुस्तम में मूल कहानी में फेर-बदल का आरोप लगा. वैसे ताजा कहानियों पर फिल्में बनाना जोखिम का काम है क्योंकि संबंधित लोग आपको अदालत तक ले जा सकते हैं और आपको हर्जाना भरना पड़ सकता है. लेकिन यह मुश्किल गोवारिकर के साथ नहीं थी तथा फिल्म और उसके प्रचार को देख कर कहा जा सकता है कि उनके पास न तो बजट की कमी थी और न ही इतिहास की समुचित प्रस्तुति के लिए आवश्यक प्रतिभा की. आशुतोष गोवारिकर ने ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर लगान और जोधा-अकबर (2008) जैसी फिल्में भी बनायी हैं.

इन फिल्मों और अन्य ऐसी फिल्मों पर नजर दौड़ायें, तो निष्कर्ष यही निकलता है कि इतिहास के नाम पर बननेवाली हिंदी फिल्मों को ‘पीरियड’ फिल्में यानी किसी विशेष काल खंड की कथावस्तु पर बनी फिल्में कहना ठीक नहीं होगा. ये फिल्में बस कॉस्ट्यूम ड्रामा हैं जो नौटंकी परंपरा का विस्तार हैं. मीरा, शहीद, बॉर्डर या हकीकत इसलिए उल्लेखनीय बन जाते हैं क्योंकि वे खास चरित्र या घटना तक सीमित हैं जिनको लेकर फिल्मकार ईमानदार रहे. 

mughal-e-azamमुगले-आजम को देखकर आप एक शानदार प्रेम कहानी और सिनेमाई भव्यता के साथ उत्कृष्ट अभिनय और पटकथा का आनंद ले सकते हैं, पर उससे अकबर या सलीम या उनके दरबार या उस दौर के बारे में आपकी समझ में कोई विस्तार नहीं होता है. वह कहानी कभी भी और किसी दौर की पृष्ठभूमि में बनायी जा सकती थी. वास्तव में, ऐसी सैकड़ों फिल्में बनी भी हैं. यही हाल जोधा-अकबर का है. सिर्फ किरदार मुगलिया इतिहास से लिये गये हैं, इतिहास नहीं.

लेख टंडन की आम्रपाली (1966) अजातशत्रु के दौर के बारे में कोई सूचना नहीं दे पाती. कहा जा सकता है कि कहानी के केंद्र में कुछ चरित्र हैं और यह जरूरी नहीं है कि सारा इतिहास फिल्मकार दिखाये. लेकिन असलियत यह है कि सिर्फ कहानी को आकर्षक बनाने के लिए इतिहास को पृष्ठभूमि के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, पर उसके संदर्भों को हटा कर.

यह सब वैसा ही है जैसे किसी दौर में फोटो स्टूडियो में लोग ऐतिहासिक इमारतों या पहाड़ों की पृष्ठभूमि में फोटो खींचवाया करते थे. अशोका (संतोष सिवन, 2001) और बाजीराव मस्तानी (संजय लीला भंसाली, 2015) इसी श्रेणी की फिल्में है जो भव्यता परोस कर इतिहास को भ्रष्ट कर जाती हैं.

इसमें कोई शक नहीं है कि भारतीय अपने इतिहास के प्रति बेहद लापरवाह होते हैं. यह और बात है कि हमारी राजनीति और सामाजिक विमर्श में सबसे अधिक टकराव इतिहास के घटनाक्रमों और उनकी व्याख्या को लेकर ही होता है, पर हम गंभीर कतई नहीं है. ऐतिहासिक धरोहरों की हालत देख लें, दस्तावेजों के रख-रखाव और उनके अध्ययन के स्तर को देख लें या फिर नवीन खोजों के प्रति बेपरवाही को ले लें, हर मायने में हम अपने भूत को भुलाने पर आमादा हैं.

इसके बरक्स आप अमेरिकी या यूरोपीय फिल्मों, उपन्यासों या चर्चाओं पर नजर डालें, तो फर्क साफ समझ में आ जायेगा. लिंकन (स्टेवन स्पिलबर्ग, 2013) को देखें, तो आपको 1860 के दशक की अमेरिकी राजनीति, गुलामी प्रथा और गृह युद्ध के कई आयामों का परिचय हो जाता है. हिंदी सिनेमा में अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि ऐतिहासिक फिल्में बनाने के लिए हॉलीवुड की तरह हमारे पास बजट नहीं है. लेकिन यह बेमानी तर्क है. जोधा अकबर या मोहेंजो दारो या मुगले-आजम के कैनवास को देख कर ऐसा नहीं लगता है कि इनके फिल्मकारों के पास पर्याप्त धन नहीं था.

pinjarमेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि बॉलीवुड को ऐतिहासिक फिल्में बनाना ही चाहिए या किसी ऐसी फिल्म को ढेर सारी जानकारियों से बोझिल बना देना चाहिए. मेरा आग्रह बस इतना है कि साधारण प्रेम कहानियों के लिए इतिहास के नाम पर महंगे सेट और पोशाक बनाना समझदारी नहीं है. इन फिल्मों के साथ यह भी दावा किया जाता है कि उनके समय के बारे में बहुत शोध कर तैयारी की गयी है, पर यह दावा परदे पर चरितार्थ होता नहीं दिखता है.

ऐतिहासिक दौर का संकेत संवादों या छोटी-छोटी घटनाओं के द्वारा भी पेश किया जा सकता है. इस तरीके को शानदार ढंग से अनुराग कश्यप ने बॉम्बे वेलवेट (2015) में इस्तेमाल किया है. इसकी झलक उनकी गैंग्स ऑफ वासेपुर (2012) में भी देखी जा सकती है. डॉ चंद्र प्रकाश द्विवेदी की पिंजर (2003) ऐसी ही एक उपलब्धि है. हॉलीवुड की लॉरेंस ऑफ अरेबिया (डेविड लीन, 1962),  ब्लड डायमंड (ऍडवर्ड ज्विक, 2006) और आर्गो (बेन एफ्लेक, 2012) जैसी फिल्मों ने इतिहास को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है. इन फिल्मों की कहानियां कहानी और किरदारों के पेंच तो खोलती ही हैं, अपने दौर के अहसास से भी हमें परिचित करा जाती हैं. ऐसी फिल्में किसी टाइम मशीन जैसी होती हैं जो दर्शक को वर्तमान से उठाकर बहुत पीछे बीते हुए समय में स्थापित कर देती हैं.

ऐसे में हातिमताई (बाबू भाई मिस्त्री, 1990) और बाहुबली जैसी फिल्में मोहेंजो दारो या मुगले-आजम से अधिक ईमानदार फिल्में हैं जो दर्शकों को एक अनजाने मिथकीय वातावरण में ले जाकर मनोरंजन प्रदान करती हैं और किसी इतिहास का प्रतिनिधि होने का ढोंग भी नहीं रचती. अब जब तकनीक है, दर्शक हैं, धन है, उम्मीद करनी चाहिए कि हमारे फिल्मकार इतिहास को लेकर अधिक संवेदनशील होंगे और विगत को ईमानदारी से पेश करने का जोखिम उठायेंगे.

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