शोले के बहाने

शोले के ४० बरस पूरे होने (रिलीज़ की तारीख़- १५ अगस्त, १९७५) की बात हो रही है, तो उस साल की अन्य फ़िल्मों पर ध्यान न जाना मुमकिन नहीं है. काफ़ी हद तक कहा जा सकता है कि १९५७ की तरह १९७५ भी हिंदुस्तानी/बॉम्बे सिनेमा का एक ख़ास साल है. फ़िल्मों की क्वालिटी के कंपटीटिव होने का अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि अगले साल फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड्स में लगभग सभी कैटेगरी- १२ में से ९- में नामित शोले सिर्फ़ बेस्ट एडिटिंग का अवार्ड ही जीत सकी थी. शिंदे साहब ने तीन लाख फ़ीट लंबे फ़ूटेज को मात्र २० हजार फ़ीट में संपादित कर दिया था.

१९७५ में रिलीज़ सफल फ़िल्मों की सूची देखिये- दीवार, ज़मीर, छोटी सी बात, आँधी, खेल खेल में, अमानुष, धर्मात्मा, ख़ुशबू, चोरी मेरा काम, दो झूठ, चुपके चुपके, फ़रार, मिली, प्रतिज्ञा, एक महल हो सपनों का, उम्र क़ैद, सन्यासी, ज़ख़्मी, वारंट, जूली, काला सोना, जय संतोषी माँ, संकल्प, गीत गाता चल, साज़िश, रफ़ू चक्कर, सलाखें, प्रेम कहानी, कहते हैं मुझको राजा, शोले… ये फ़िल्में औसत से लेकर मेगा तक हिट हुई थीं. दो फ़िल्मों- शोले और जय संतोषी माँ– ने तो कमाई के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिये थे. सन्यासी, दीवार और प्रतिज्ञा हिट होने के मामले में बाद के स्थानों पर रही थीं.

sholayजब १५ अगस्त को शोले रिलीज़ हुई, दीवार मेगा हिट हो चुकी थी और थियेटरों में अब भी जय संतोषी माँ का जलवानुमा थी. मेरी नज़र में, ये तीन फ़िल्में उस साल की और शायद उस दौर की प्रतिनिधि फ़िल्में मानी जा सकती हैं. प्रोडक्शन, कथानक और रिसेप्शन के मामले में. शोले गंवई भारत के सामंती, ख़तरनाक और जड़ समाज और शहर में स्थित राज-सत्ता के केंद्रों के दख़ल की अनूठी दास्तान है. उससे से भी बड़ी पहेली है कि दर्शक इमर्जेंसी के उन महीनों में सिनेमा में प्रोजेक्टेड सत्ता के साथ खड़ा था, वह गब्बर से भयभीत था, पर गब्बर को समझना नहीं चाह रहा था. यह अब भी है. सिप्पी को समझाने की नहीं पड़ी है.

दीवार का विजय परिभाषित है. उसके संदर्भ से देखें, तो बाद में सत्या और भीखू म्हात्रे को समझ सकते हैं. लेकिन, गब्बर को मदर इंडिया के बिरजू के संदर्भ में नहीं देखा गया. यह फ़िल्म आधुनिक राज्य की सामंतवाद से टैक्टिकल नेक्सस को सिलेब्रेट कर रही थी, पर चोपड़ा की दीवार राज्य सत्ता और आधुनिक भारत के करीब तीन दशकों की असफलता को रेखांकित कर रही थी. हर परेशान कर देनेवाले दृश्य में बजता था- ‘सारे जहाँ से अच्छा…’ कमाल देखिये, दोनों फ़िल्में सलीम-जावेद की जोड़ी ने ही लिखा था. प्रोडक्शन और परफ़ॉर्मेंस के बारे में क्या कहना है! स्टार कास्ट, किस्सागोई, डायलॉग…!

इन फ़िल्मों की कामयाबी के बीच जय संतोषी माँ के मेगाहिट को कैसे समझा जाए? न बजट, न स्टार कास्ट, न प्रचार, शुरूआती असफलता… और फिर रनवे सक्सेज़. जो दर्शक ठाकुर का है, गब्बर का है, वीरू और विजय का है, उसे जय संतोषी माँ के कथानक और कलाकारों में ऐसा क्या दिखा? वह तो कोई पौराणिक आख्यान या धार्मिक महाकाव्य का सिनेमाई रूपांतरण भी न था? इन फ़िल्मों की कामयाबी और दशकों बाद भी कल्ट बने रहना कहीं हमारे बहुआयामीय मानसिक संरचना, विक्षोभ, बेचैनी और आकांक्षाओं का नतीज़ा तो नहीं! सिनेमा को समाज के दर्पण के रूप में पढ़ा जाए या नेशनल अलेगोरी के रूप में? दर्शक भरत मुनि का रसिक है या चार्ली चैप्लिन का इग्नोरैंट फ़ेलो? वह घटक का प्रोजेक्शन है या रे का प्रोजेक्ट? वह मोंटाज का उपभोक्ता है या लाइट एंड साउंड का भुक्तभोगी? वह अवंतिका का रेपिस्ट है या बजरंगी के लिए दुआगो?

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s