मराठी सिनेमा से जगतीं उम्मीदें

नागराज मंजुले द्वारा निर्देशित फिल्म ‘सैराट’ मराठी सिनेमा के इतिहास की सबसे चर्चित और कामयाब फिल्म बन गयी है. इस साल महेश मांजरेकर की ‘नटसम्राट’, 2013 में संजय जाधव की ‘दुनियादारी’ और 2010 में रवि जाधव की ‘नटरंग’ ने भी सफलता के शिखरों को छुआ है. ‘सैराट’ पहली ऐसी मराठी फिल्म है जो कमाई के सौ करोड़ क्लब में शामिल होने जा रही है. इन फिल्मों की खास बात यह है कि इन्होंने टिकट खिड़की पर भारी संख्या में दर्शकों को जुटाने के साथ अपनी कहानी, प्रस्तुति, शिल्प और कला के स्तर पर प्रशंसा भी बटोरी है. अब तो यहां तक कहा जाने लगा है कि मराठी सिनेमा की हालिया उपलब्धियां भारतीय सिनेमा के पुनर्जागरण का संकेत हैं. बहरहाल, हमें यह भी याद रखना चाहिए कि भारतीय सिनेमा का पहले गौरवपूर्ण अध्याय मराठियों ने ही लिखा था. जिस धरती पर- पहले कोल्हापुर, फिर पूना और अंततः बंबई- ये अध्याय लिखे गये, वह भी मराठी के भूगोल का ही हिस्सा है. दादासाहेब तोरणे, दादासाहेब फाल्के, बाबूराव पेन्टर, व्ही शांताराम जैसे उन पुरखों की आत्मा आज अपने वंशजों की उपलब्धियों पर गर्वान्वित हो रही होंगी.   

Sairat‘सैराट’ की कहानी पारधी जाति के युवा और पाटिल जाति की युवती की प्रेम कहानी है. जातिगत भेदभाव की वजह से इनके सम्बन्ध स्वीकार्य नहीं हो सकते थे, लिहाजा दोनों गांव से भाग कर शहर चले जाते हैं और शादी कर लेते हैं. लड़के के गरीब परिवार को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है. कुछ समय बाद उनके घर एक बच्चा भी पैदा होता है. पर लड़की के परिवारवाले दोनों की हत्या कर देते हैं. कथित ‘हॉनर किलिंग’ हमारे समाज का भयावह सच है. जातिगत उत्पीड़न का भी बड़ा लंबा सिलसिला रहा है. सामाजिक और आर्थिक रूप से अलग-अलग वर्गों के युवाओं के बीच प्रेम संबंधों पर फिल्में भी बनती रही हैं. फिर यह सवाल स्वाभाविक है कि आखिर ‘सैराट’ को लोग इतना क्यों पसंद कर रहे हैं. किसी फिल्म की कामयाबी के कई कारण हो सकते हैं. ‘सैराट’ भी मनोरंजक है, नये होने के बावजूद कलाकारों का अभिनय शानदार है, गीत-संगीत भी आकर्षक हैं. फिर भी फिल्म में शिल्प या प्रस्तुति के स्तर पर कोई खास नयापन या प्रयोग नहीं है. वह ग्लैमरस भी नहीं है जो मौजूदा फार्मुले का अहम अंग है. मंजुले की पिछली फिल्म ‘फैंड्री’ जाति, शोषण और विलगन के विभिन्न पहलुओं को अधिक जटिलता और संवेदनशीलता के साथ रेखांकित करती है. दरअसल, ‘सैराट’ मात्र एक प्रेम कहानी नहीं है. वह एक ऐसी प्रेम कहानी है जो सिनेमा और समाज में बार-बार दोहराये जाने के बाद भी एक असंभावना है. इस असंभावना को संभाव्य बनाने की जब भी ईमानदार कोशिश होगी, उसे सराहना मिलेगी. यह ‘सैराट’ की सफलता की एक विवेचना है. 

लेकिन जब मंजुले की सफलता को मराठी सिनेमा के व्यापक परिदृश्य में रख कर देखें, तो यह भी सूचना मिलती है कि भारतीय सिनेमा का यह हिस्सा बदलाव के दौर से गुजर रहा है, जहां घिसे-पिटे फार्मुले से इतर कुछ कहने, सुनाने और दिखाने का साहस आकार ले रहा है. इस साल के शुरू में आयी जोरदार सफल फिल्म ‘नटसम्राट’ संतानों की संवेदनहीनता के कारण बेहाल सेवानिवृत अभिनेता और उसकी पत्नी की कथा कहती है. बीते साल भर का हिसाब लगायें, तो छह मराठी फिल्में बड़े पैमाने पर सफल रही हैं- ‘कटयार कलिजात घुसाली’, ‘मुंबई पुणे मुंबई 2’, ‘टाइमपास 2’, और ‘क्लासमेट’. इस सूची में ‘हाइवे’ और ‘डबल सीट’ जैसी फिल्में भी हैं. पिछले कुछ सालों में ‘श्वास’, ‘हरिश्चंद्राची फैक्ट्री’, ‘कोर्ट’, ‘किल्ला’ ‘नटरंग’ जैसी फिल्मों ने न सिर्फ मराठी, बल्कि देश-दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भी प्रशंसा बटोरी हैं. मराठी सिनेमा के इस नवोन्मेष ने मुंबई फिल्म उद्योग के बड़े नामों को अपनी ओर आकृष्ट किया है और वे वहां अपना धन और अपनी विशेषज्ञता लगाने के लिए तैयार हैं.killa-still

वर्ष 2015 में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित ‘कोर्ट’ निर्देशक चैतन्य तम्हाणे की पहली फिल्म है. इसे भारत की ओर से ऑस्कर पुरस्कार के लिय भी चयनित किया गया था. ‘कोर्ट’ ने अब तक 18 राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीता है जो कि एक रिकॉर्ड है. इस फिल्म में एक दलित सांस्कृतिक कार्यकर्ता के सरकार, पुलिस और न्याय-तंत्र के द्वारा परेशान करने की दास्तान है. अपने पिता के मरने के बाद जीवन की तकलीफों से जूझ रहे ग्यारह साल के बच्चे की कहानी पेश की पिछले साल अविनाश अरुण की ‘किल्ला’ ने. यह भी उनकी पहली फिल्म है. अविनाश ही चर्चित हिंदी फिल्म ‘मसान’ (नीरज घेवन) के सिनेमैटोग्राफर हैं. ‘कोर्ट’ और ‘किल्ला’ को समीक्षकों ने बहुत पसंद किया, पर टिकट खिड़की पर इनका प्रदर्शन सामान्य रहा था. लेकिन सुबोध भावे की पहली फिल्म ‘कटयार कलिजात घुसाली’ ने अभिनय और संगीत के दम पर बॉक्स ऑफिस के सारे पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिये. पिछले ही साल आई उमेश कुलकर्णी और गिरीश कुलकर्णी की फिल्म ‘हाइवे’ को भी समीक्षकों और दर्शकों का पूरा समर्थन मिला. पूरी फिल्म पुणे-मुंबई एक्सप्रेस हाइवे पर ही घटित होती है. मनोरंजन और शानदार प्रस्तुति के अलावा इस फिल्म को साहसिक प्रयोगधर्मिता के लिए भी सराहा गया है. ‘हाइवे’ के कुलकर्णीद्वय पहले भी ‘विहिर’ और ‘देऊल’ जैसी बेहद खास फिल्में बना चुके हैं. 

Nana-Patekar-Natsamrat-Marathi-Movieजब आप यह लेख पढ़ रहे हैं, ‘सैराट’ के साथ एक अन्य मराठी फिल्म दर्शकों की भारी भीड़ आकर्षित कर रही है. यह फिल्म है सामान्य रोमांस की कहानी- ‘लाल इश्क’ और इसकी निर्देशिका हैं स्वप्ना वाघमारे जोशी. इन फिल्मों की सफलता से एक बात और जाहिर होती है कि मराठी सिनेमा कथानक और प्रस्तुति के अनेक स्तरों पर एक साथ सक्रिय है. इस सक्रियता को सराहा भी जा रहा है और दर्शक टिकट खरीद कर इन्हें देख भी रहे हैं. एक तरफ मुंबई की हिंदी फिल्मों का स्टार सिस्टम और विज्ञापन के लिए भारी बजट है, तो दूसरी ओर टेलीविजन तथा विभिन्न भाषाओं में डब की गईं दक्षिण भारतीय फिल्में हैं. गाहे-ब-गाहे हॉलीवुड से ऐसी फिल्में भी आ जाती हैं जिनके सामने मुंबईया फिल्में भी धाराशायी हो जाती हैं. ऐसे में बीते कुछ सालों से लगातार सफल फिल्में देकर और व्यापक सम्मान बटोर कर मराठी फिल्मों ने एक बार भी इस सच को साबित किया है कि जमीन से जुड़ी कहानियों को कलात्मकता और पेशेवर क्षमता के साथ पेश किया जाये, तो उन्हें दर्शक जरूर पसंद करते हैं. यहां यह भी उल्लेख किया जाना चाहिए कि हिंदी और दक्षिण भारतीय फिल्मों की तुलना में मराठी फिल्मों का बजट बहुत ही कम होता है. इस लिहाज से उनकी सफलता का स्तर अधिक बड़ा है. सत्तर करोड़ की फिल्म के सौ करोड़ कमाने और दो-चार करोड़ की फिल्म के पचास या सौ करोड़ कमाने में बड़ा अंतर है. यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि मराठी सिनेमा का गौरवपूर्ण अध्याय रच रहे अधिकतर निर्देशक, तकनीकी पक्ष से जुड़े लोग और कलाकार नवोदित हैं या उनके पास अनुभव कम है. आबादी और लोकप्रियता के लिहाज से मराठी सिनेमा के लोग दक्षिण भारत या भोजपुरी सिनेमा से बहुत कम प्रभावशाली हैं. 

निश्चित तौर पर ये उपलब्धियां भारतीय सिनेमा के लिए संदेश भी हैं और सबक भी. मुंबई फिल्म उद्योग में भी बीते सालों में प्रयोगधर्मिता का सिलसिला शुरू हुआ है तथा दक्षिण से भी कुछ उम्दा फिल्में आई हैं, पर उनका मुख्य स्वर अब भी मुनाफे और सतही मनोरंजन को ही संबोधित है. इन इलाकों में फिल्मों से जुड़े लोग मराठी से सीख रहे हैं और उन्हें सीखना भी चाहिए. इतिहास में ऐसे अवसर बार-बार नहीं आते हैं, जब कलात्मक निराशा के दौर में उम्मीद की बिजलियां लगातार चमकती हों. मराठी फिल्मों की एक सीमा भाषा और पहुंच की है. इस कारण दूसरे क्षेत्रों के अधिकतर दर्शक उनका आनंद नहीं उठा पाते हैं. फिल्म वितरण में आर्थिक लाभ को सबसे पहले रखा जाता है. दर्शकों की मांग के बावजूद मराठीभाषी इलाकों में भी मराठी सिनेमा को अधिक थियेटर नहीं मिल पाते हैं, उत्तर, पश्चिम और दक्षिण भारत की तो बात ही छोड़ दें. मराठी सिनेमा को अन्य इलाकों के दर्शकों तक पहुंचने की कोशिश करनी चाहिए, और अन्य भाषाओं के लोगों को भी इन फिल्मों का आग्रह करना चाहिए. इससे हमारी संवेदनशीलता और कला को परखने की क्षमता भी बढ़ेगी तथा जड़ पड़ चुकी रूचि का परिष्कार भी होगा. इस प्रक्रिया की एक धीमी शुरूआत हो भी चुकी है. इसीलिए मेरा मानना है कि मराठी सिनेमा से कई स्तरों पर उम्मीदें जगी हैं, और आनेवाले दिनों में इन उम्मीदों को हकीकत की जमीन भी भी मिलेगी. ‘सैराट’ का अर्थ दौड़ना है. यह दौड़ सार्थक है. 

(‘यथावत’ में प्रकाशित)

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