मदर इंडिया

mother-indiaवर्ष 1957 में प्रदर्शित हुई महबूब खान द्वारा निर्देशित ‘मदर इंडिया’ हमारे देश की सबसे लोकप्रिय फिल्मों में से एक है. तमाम परेशानियों से संतप्त माता के रूप में राधा का चरित्र नरगिस ने निभाया था. यह चरित्र हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक बुनावट में मां का आदर्श स्वरूप है. फिल्म ने भारतीय स्त्री के सभी अवधारणात्मक उत्कृष्ट गुणों का समायोजन राधा के रूप में किया है. परिवार की आम भूमिका से वह स्त्री फिल्म के अंत तक भारतीय राष्ट्र का रूपक बन जाती है. इस चरित्र का विशिष्ट प्रभाव का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि बाद की पॉपुलर फिल्मों और साहित्य में मां की छवि उसी के अनुरूप रची जाने लगी.

इस संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि ‘मदर इंडिया’ 1940 में महबूब खान द्वारा बनायी गयी ‘औरत’ का रीमेक थी. उस दौर में ‘भारत माता’ का छवि-बाहुल्य और आधुनिक भारत में स्त्री की भूमिका को लेकर व्यापक चर्चा ने निश्चित रूप से महबूब खान की दृष्टि पर असर डाला था. फिल्म में राधा के विभिन्न चित्रों पर अगर नजर डालें, तो वह बहुधा क्लोज-अप में और प्रमुख छवि के रूप में यानी बतौर ‘आइकॉन’ है. यह मां की विराटता का द्योतक है, उसके व्यक्तित्व की व्यापकता का सूचक है तथा उसकी भावनात्मक और शारीरिक उपस्थिति के गांभीर्य का संकेतक है.  

यह फिल्म ऑस्कर पुरस्कारों की सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म श्रेणी में भारत की पहली प्रस्तुति थी और मात्र एक वोट से पुरस्कार जीतने से वंचित रह गयी थी. इस फिल्म से जुड़ा एक दिलचस्प वाकया यह है कि जब फिल्म के नाम के साथ शूटिंग के लिए फिल्म रील उपलब्ध कराने का आवेदन दिया गया तो सरकार परेशान हो गयी. उसे आशंका थी कि कहीं यह फिल्म 1927 में छपी कैथरीन मेयो की किताब ‘मदर इंडिया’ पर तो आधारित नहीं है. उस किताब में मेयो ने भारतीय समाज में महिलाओं की अत्यंत खराब स्थिति की खूब आलोचना की थी. खुद महत्मा गांधी ने उस किताब को भारत की छवि खराब करने के उद्देश्य से लिखा हुआ बताया था. मेयो की ‘मदर इंडिया’ के जवाब में 50 से अधिक किताबें भी लिखीं गयी थीं. बहरहाल, फिल्म की स्क्रिप्ट देखने के बाद सरकार आश्वस्त हो गयी थी कि इसका आधार वह किताब नहीं है. महबूब खान की तरफ से यह भी कहा गया कि वास्तव में यह फिल्म उस किताब की आलोचना है.

‘मदर इंडिया’ के फिल्मांकन पर अमेरिकी और सोवियत रूस की कुछ फिल्मों का स्पष्ट प्रभाव है, पर कथानक का भारतीयकरण इस कदर ठोस है कि यह फिल्म भारतीय सिनेमा का अप्रतिम उदाहरण मानी जाती है. फिल्म के आधिकारिक प्रदर्शन से दो दिन पहले इसे राष्ट्रपति भवन में दिखाया गया था.

(प्रभात खबर में २० मार्च को छपी टिप्पणी)

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