मुसलिम पहचान पर एक अध्ययन

Beyond Hybridity and Fundamentalism: Emerging Muslim Identity in Globalized India/Tabassum Ruhi Khan/OUP/2015

ढाई दशकों के राजनीतिक और आर्थिक बदलावों का व्यापक असर देश के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन पर भी पड़ा है तथा इन प्रभावों पर गंभीर अध्ययन भी हुए हैं. लेकिन, यह एक विडंबना ही है कि देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित सामाजिक, आर्थिक और मानविकीय अध्ययनों का बड़ा अभाव है. यह स्थिति तब है, जबकि सांप्रदायिकता, आतंकवाद, भेदभाव और पिछड़ेपन जैसे प्रश्नों के संदर्भ में यह समुदाय निरंतर चर्चा और सुर्खियों का विषय बनता रहता है. ऐसी स्थिति में तब्बसुम रुही खान की किताब ‘बियोंड हाइब्रिडिटी एंड फंडामेंटलिज्म : इमर्जिंग मुसलिम आइडेंटिटी इन ग्लोबलाइज्ड इंडिया’ एक महत्वपूर्ण और आवश्यक हस्तक्षेप है.

beyond-hybridityअमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (रिवरसाइड) में अध्यापिका तब्बसुम दिल्ली के जामिया मिलिया इसलामिया में पढ़ चुकी हैं तथा इस विश्वविद्यालय और इससे सटे मुसलिम-बहुल इलाके को ही उन्होंने अपनी किताब का विषय बनाया है. लेखिका ने जामिया बस्ती की स्थानीय सच्चाइयों तथा वैश्विक स्तर पर रची-गढ़ी जा रहीं कल्पनाओं, विचारधाराओं, जीवन-शैली, आत्म-पहचान जैसे बिंबों के बीच मुसलिम युवाओं की अपेक्षाओं की निर्मिति को रेखांकित करने का प्रयास किया है. इस प्रयास में वह बताती हैं कि भारत के भविष्य में मुसलिम समाज का निवेश है और इस कारण समान नागरिक के तौर पर उनके अधिकारों का दावा भी पुष्ट होता है. यह इस शोध की बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि मुसलिम समाज के पिछड़ेपन और वंचना को अभिव्यक्त करनेवाले अध्ययन और रिपोर्ट ऐसा कर पाने में असफल रहे हैं. राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में होनेवाली अभिव्यक्तियां भी उन रिपोर्टों पर आधारित होने के कारण मुसलिम समाज के दावों की वैधता को इस त्वरा के साथ प्रस्तुत नहीं कर सकी हैं. 

 

khan

तब्बसुम रुही खान

हालांकि यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि इतनी बड़ी आबादी, जो वर्गीय, जातीय और क्षेत्रीय विविधता से भी पूर्ण है, के बारे में एक इलाके के अध्ययन के तौर पर विमर्श तैयार नहीं किया जा सकता है. लेकिन, इस किताब के विषय-वस्तु के रूप में जामिया का अध्ययन हमें समुदाय, विशेषरूप से उसकी युवा आबादी के मानस, उसकी आकांक्षाओं तथा चिंताओं से निश्चित रूप से अवगत कराता है. मुसलिम समाज से जुड़ी सभी समस्याओं- घनी आबादी के रूप में निवास (घेटो), युवाओं की बेचैनी, पहचान का संकट, बहुसंख्यक राजनीति और सोच का दबाव और भय, आर्थिक परेशानियां- से जामिया का इलाका ग्रस्त है. आतंकवादी और कट्टरपंथी सोच के प्रचार-प्रसार से प्रभावित क्षेत्र के रूप में भी इस इलाके को बताने और जताने की कोशिशें हुई हैं. तब्बसुम खान बताती हैं कि मुसलिम युवा सैटेलाइट टीवी, डॉ जाकिर नायक जैसे प्रचारकों, बाजारवाद और उपभोक्तावाद तथा जामिया मिलिया इसलामिया जैसे शिक्षा संस्थान के परिवेश में स्वयं को अपनी पारंपरिक पहचान तथा आधुनिक कारकों से प्रभावित होकर अभिव्यक्त कर रहे हैं. यह भी उल्लेखनीय है कि किताब का एक विस्तृत अध्याय मुसलिम महिलाओं के बारे में है जो लेखिका के शब्दों में ‘आधुनिकता से अच्छी तरह से वाकिफ होकर और उसे एक हद तक स्वीकार कर उसके कुछ बुनियादी बिंदुओं की आलोचना कर सकने की चेतना से सक्षम हैं’.

किताब का एक निष्कर्ष यह है कि मुसलिम युवा, जिसे आधुनिकता का भान है और उसके साथ तालमेल के लिए वह इच्छुक भी है, अपने अलग-थलग होने की मौजूदा स्थिति को अपनी शर्तों पर बदलना चाहता है. इस प्रयास के लिए उसमें हिचक तो है, पर उसकी चेतना समृद्ध है. मुसलिम समाज और उसकी साझेदारी के महत्व को समझने की प्रक्रिया को इस किताब से निश्चित तौर पर मदद मिलेगी, परंतु देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे अध्ययनों की आवश्यकता है, क्योंकि देश के वैविध्य की तरह मुसलिम समाज की पहचान भी विविधता से भरी है.

(प्रभात खबर/29 जनवरी, 2016 को प्रकाशित)

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