कहो जी तुम क्या क्या खरीदोगे…

कोठागोईः चतुर्भुज स्थान के किस्से/प्रभात रंजन/वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली/2015

दुनिया के ‘संगतखाने’ के बेशुमार मकामों में से एक चतुर्भुज स्थान, जो ‘हर चाहनेवाले का दिलचाहा’ है, के किस्सों को ‘कोठागोई’ में संजोते हुए प्रभात रंजन ने अनेक कोठों और कोठियों की चौखट लांघी है, और उन्हें लिखते हुए वे विधाओं की चौखटों की परवाह भी नहीं करते. बारह किस्सों की यह किताब किस्सा तो है ही, वह इतिहास, समाजशास्त्रीय अध्ययन और सांस्कृतिक रिपोर्ट भी है. साथ ही, वह बहुत गहरे कहीं टीसती बेचैनी का त्रासद काव्य भी है.

प्रभात रंजन ने भला किया जो शुरू में ही कह दिया कि ‘इस पुस्तक में जो लिखा है सब झूठ है’. लेकिन सच-झूठ का हिसाब कौन करे जब ‘दर्द का किस्सा यार बहुत है’ और ‘जिन्दगी इस पार जितनी जिन्दगी उस पार है’. अभी तो काफ्का का यह बयान याद आ रहा है कि ‘अगर मैं अनंत तक अस्तित्व में रहूँगा, तो फिर मैं कल कैसे अस्तित्व में रह सकूँगा?’

kothagoiदिल और दुनिया की तरह कोठे और बस्तियाँ भी बसती रही हैं, उजड़ती रही हैं. चाह, वाह और आह का सिलसिला चलता रहा है, चल रहा है. क्या इस निस्पृह भाव से चतुर्भुज स्थान के किस्से पढ़े जा सकते हैं? दिल्ली के जीबी रोड पर रवीश कुमार की रिपोर्ट जीबी रोडः एक अंतहीन सड़क’ भी क्या बस एक ‘पाठ’ है? फिल्म साधना (बीआर चोपड़ा, 1958) के दृश्य, संवाद और गीत बस गल्प हैं? रसिक की जिम्मेदारी बस रसास्वादन और भाव-विभोर होने की है? या फिर इस किताब के संदर्भ में मलिनी अवस्थी से रजामंदी के साथ इस बात से संतोष कर लिया जाए कि ‘मुझे दिली सकून है कि मुजफ्फरपुर की शापित गायिकाओं का गुमनाम इतिहास अब गुमनाम नहीं रहेगा’.

प्रभात रंजन कहते हैं, ‘हाशिए का जीवन, उससे जुड़ी कहानियाँ कुछ लोगों तक पहुँच जायें, यही कोठागोई का उद्देश्य है’. साधना फिल्म के बारे में बीआर चोपड़ा कहते हैं कि वेश्यावृति एक मानव-निर्मित लांछन है और उसकी जिम्मेवारी है कि वे इसके पीड़ितों को वापस समाज का हिस्सा बनाये. रवीश कुमार अपनी रिपोर्ट में कहते हैं, ‘यहाँ हर किसी के पास अनगिनत कहानियाँ हैं. इनकी जिन्दगी में झाँककर क्या दिखा, और क्या दिखा पाया आपको मालूम नहीं’.

बहरहाल, मुख्यधारा के इतिहास में बड़ी घटनाएँ दर्ज होती हैं और उन्हीं का हिसाब होता है, उन्हीं का बखान होता है, उन्हीं की मिसाल दी जाती है. दिलेयुस ने ‘डिफरेंस एंड रिपीटिशन’ में लिखा है कि बड़ी और शोर-गुल से भरी घटनाओं के नीचे चुप्पी की छोटी हलचलें दबी होती हैं. ‘कोठागोई’ उन्हीं हलचलों की चुप्पी को टटोलती है. रेमंड विलियम्स विभिन्न चुप्पियों में उसके लिए, जो न तो इत्मीनान से है और न ही पूरी तरह से अभिव्यक्त है, कोई शब्द नहीं पा सके. ‘पॉलिटिक्स एंड लेटर’ में उन्होंने लिखा है कि इस शब्द को खोजा जाना चाहिए. उन्होंने यह भी कह दिया है कि ये चुप्पियां उतनी चुप भी नहीं हैं.

प्रभात रंजन भी कोई पारिभाषिक शब्द खोजने की झंझट में नहीं पड़े. आखिर उन्होंने शुरू में ही कह जो दिया है कि भई, यह सब झूठ है. वे इतिहास लिखने का दावा नहीं करते, लेकिन आधुनिक भारत के निर्माण की विशाल प्रक्रिया के हंगामे और शोर में समय के राजमार्ग से थोड़ा परे स्मृति की पगडंडियों में गहरी धँसी हुई खिलखिलाहटों, सिसकियों और कचोट को हम तक पहुँचा रहे हैं. ये हँसी, ये दर्द और ये अहसास उन किरदारों के हैं, जिन्हें राष्ट्रीय गौरव की पोथियों में जगह नहीं दी जाएगी, उनके नाम पर सड़के नहीं होंगी और न ही उनकी जयंती मनायी जाएगी. वे जब थे, तब कुछ नहीं थे, और अब जब नहीं हैं, तो उनके किस्सों में अपने समाज के बनने, बिगड़ने और बदलने को पढ़ा जा सकता है.

इतिहास व्यक्तियों या राष्ट्रों के होते हैं, समाजों के नहीं. समाज किस्सों में ही दर्ज होता है, उसे वहीं ठौर मिलता है. एनसीइआरटी की किताबों में न तो चतुर्भुज स्थान है, न ही कमाठीपुरा. चतुर्भुज स्थान के वासी जानकीवल्लभ शास्त्री तो वहाँ मिल जाते हैं, जैसे सोनागाछी के रबींद्रनाथ ठाकुर मिलते हैं, पर सोनागाछी नहीं. रवीश की रिपोर्ट में एक पिता कह रहा है कि लड़केवालों ने हिदायत दी कि शादी के कार्ड पर जीबी रोड मत लिखवाइएगा. मनोरमा को सुमन बन कर चतुर्भुज स्थान आना पड़ता है. साधना फिल्म की चंपा कोठे से बाहर रजनी बन जाती है.

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प्रभात रंजन

आखिर शहर को इन बदनाम कोनों से इतना परहेज क्यों है? परहेज है, तो फिर ये कोने बसते कैसे रहते हैं, बने कैसे रहते हैं? फिल्म साधना में नायक संस्कृत साहित्य का शिक्षक है और एक कक्षा में वह शुद्रक की कथा पढ़ा रहा है जिसमें एक राज कुमार और एक वेश्या की प्रेम कहानी है. छात्र पूछते हैं कि क्या वह ऐसे किसी प्रेम को स्वीकार करेंगे, तो शिक्षक मना करते हुए वेश्याओं को पापी की संज्ञा देता है.

यह लिखते हुए शरत बाबू का देवदास याद आता है जो मरते वक्त देखता है कि स्वर्ग में सोने के सिंहासन पर उसकी माँ और पारो के साथ चंद्रमुखी भी बैठी है. प्रभात रंजन के जगत भ्रमर कौंध जाते हैं. चतुर्भुज स्थान की पन्ना को लंदन भी तो कोई लेकर गया होगा! साधना का नायक भी तवायफ के प्रेम में पड़ता है और घर लाता है. बहरहाल, रजवाड़े, दरबारों, जमींदारियों, अफसरी, विधायकी के बाद अब पंचायती राज का जलवा भी उतार पर है. रसिक भी हुए और आशिक भी. तवायफों को घर न मिला हो, प्यार और दर्द तो भरपूर मिला ही है.

साधना में दृश्य है- नायिका, जो कि तवायफ है, नवविवाहिता की तरह सज-धज कर महफिल में आती है. कोठे पर जमा रईसों की भीड़ तंज करती है कि चंपा तू एक तवायफ है, कुलवंती बनने के सपने क्यों सजा रही है. चंपा बिफर उठती है- ‘औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाजार दिया’. इस गीत का शायर साहिर एक अन्य फिल्म प्यासा (गुरुदत्त, 1957) में भी समाज के विरुद्ध तवायफों-वेश्याओं की ओर से अभियोग-पत्र दायर करता है. चतुर्भुज स्थान की चंदा गाती है- ‘अपना जिया जैसे रात अँधेरिया’.

बहरहाल, हुनर और हादसों के बीच गुजरती तवायफों के कल्याण की सभ्यतागत चिंता से ‘कोठागोई’ बच-बचाकर निकल जाती है. लेखक सुधार की आकांक्षा और अति-संवेदना की व्याधि से ग्रस्त नहीं होता. आधुनिक और यथार्थ के दबाव में कहीं विचलित होता भी है, तुरंत सँभल जाता है. वह किस्सों को सुनता-सुनाता जाता है. ‘प्यार किये दिल घाव किये हो/दिल लेके इल्जाम दिये हो… दिल पे आरी चलत है.’ ‘और आपने दिया क्या?/बदनामियों का चर्चा मेरे नाम कर दिया!’ बदनाम कोठों से सुर-ताल को साथ लिये ये गीत तब तक गुँजते रहेंगे, जब तक हर तवायफ की कहानी नहीं लिखी जाती. लेखक कहता है, ‘इतिहास का न्याय आखिरी नहीं होता!’ ‘कोठागोई’ का सिलसिला चलता रहेगा. कभी चतुर्भुज स्थान, तो कभी सोनागाछी, तो कभी पन्ना के शहर लंदन का सोहो…

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