कहे कबीर का कीजै

पुस्तक: अकथ कहानी प्रेम की- कबीर की कविता और उनका समय
लेखक: प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन
मूल्य: 500 रुपए (सजिल्द), 250 रुपए (अजिल्द)
पृष्ठ: 455

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बहुत कम किताबों के साथ ऐसा होता है कि वह छपने के साथ ही व्यापक चर्चा का केंद्र बन जाती हैं. प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल की कबीर पर किताब ऐसी ही कुछ किताबों में एक है जो उनके कबीर को पढ़ते-गुनते विगत तीस सालों के निरंतर शोध का परिणाम है जिसे वह ‘जिज्ञासा-यात्रा’ की संज्ञा देते हैं. यह यात्रा कबीर की कविता के ज़रिये उनकी आध्यात्मिकता, प्रेम-संवेदना और सामाजिकता को समझने की कोशिश करती है. इस यात्रा में देशज मनीषा और औपनिवेशिक हस्तक्षेप की समानान्तर पड़ताल राह बनाती चलती है. यात्रा के अंत तक कबीर की विराट छवि उभरती है, वहीं अब तक स्वार्थ, सुविधा और संकीर्णता के संकुचित सांचे में ढाली गयीं कबीर की कई प्रतिमाएं ढह जाती हैं अपने ढालने वालों के साथ. आलोचना संस्कृति का अनिवार्य तत्व है. कबीर अपने समय को पढ़ रहे थे, लेखक कबीर और उनके समय को पढ़ रहा है. इस प्रक्रिया में वह अपने यानि हम सबके समय को भी पढ़ता है. इस तरह वह इस सांस्कृतिक कार्य को साधते हुए संस्कृति को भी पढ़ता है. इसीलिए यह किताब साहित्य के विद्यार्थियों-अनुरागियों के लिये ही नहीं, सामाजिक विज्ञान और सांस्कृतिक अध्ययन से जुड़े लोगों के लिये भी महत्वपूर्ण हो जाती है.

kabirकिताब में दस अध्याय हैं. पहले अध्याय में प्रो अग्रवाल ने कबीर के अध्ययन की समस्याओं को रेखांकित किया है. उनकी दृढ़ मान्यता है कि कबीर और उनके समय को औपनिवेशिक ज्ञानकाण्ड के षड्यंत्र तथा उससे बनी बौनी बौद्धिकता के भरोसे नहीं, बल्कि देशभाषा के स्रोतों और तत्कालीन समाज के रोज़मर्रा के बोध से ही समझा जा सकता है. दूसरा अध्याय इसी गुत्थी को सुलझाता है. लेखक ने विभिन्न अध्ययनों, शोधों और स्रोतों के आधार पर यह स्थापित किया है कि औपनिवेशिक ज्ञानकाण्ड और इससे प्रभावित-आतंकित बौद्धिकता ने नगरीकरण और व्यापारिक गतिविधियों से भरा-पूरा और अपने समकालीन समाजों से कहीं अधिक समृद्ध और गतिमान समाज को जड़ माना जबकि वास्तविकता इसके बिल्कुल उलट थी. उन्होंने साबित किया है कि भक्ति के व्यापक लोकवृत और व्यापार के विश्वव्यापी विस्तार के पर्यावरण में देशज आधुनिकता की निर्माण-प्रक्रिया तेज़ हो रही थी जिसे औपनिवेशिक सत्ता ने बाद में अवरुद्ध कर दिया.

यूरोपीय आधुनिकता के ही एकमात्र आधुनिकता होने के दावे को पिछले कुछ समय से ठोस चुनौती मिल रही है. देश-विदेश के विद्वानों के निष्कर्षों और अपने अध्ययन और तर्कों से लेखक ने बताया है कि भारतीय समाज को जड़ कहे बिना यूरोपीय श्रेष्ठता के दंभ और उसके औपनिवेशिक लूट को न तो वैचारिक आधार मिल सकता था और न ही उनके व्यापार के लिये फ़ायदेमंद ज़मीन. यह अध्याय हमें अपने इतिहास को सही रूप में समझने के लिये नयी दृष्टि और औज़ार देता है.

तीसरे अध्याय में कबीर के जीवन-वृत्त की पड़ताल है. उनकी कविता और उनसे जुड़ी किंवदंतियों के ज़रिये लेखक कबीर की जीवन यात्रा का मार्मिक वर्णन प्रस्तुत करते हैं. कबीर मगहर में हैं और काशी की याद में तड़प रहे हैं. यह वही कबीर हैं जो यह कह कर काशी छोड़ आए थे कि अगर काशी में मरने-मात्र से स्वर्ग मिलेगा तो फिर इतनी भक्ति का क्या मतलब. उसी कबीर की काशी के लिये तड़प कबीर के व्यक्तित्व का नया आयाम खोलती है जिसमें आत्म-भावनाओं को अभिव्यक्त करने का साहस भी है. ऐसा ही कुछ वह तब कर रहे हैं जब वह हिन्दुओं और मुसलमानों को फूल देकर हमेशा के लिये विदा हो जाते हैं. इसी अध्याय में प्रो. अग्रवाल उन मान्यताओं को ख़ारिज़ करते हैं जिनमें कहा जाता है कि कबीर की आवाज़ हाशिये की आवाज़ है. ऐसे आदमी की आवाज़ हाशिये की नहीं हो सकती जिसकी शिकायत पंडित-मौलवी बादशाह से करें या जिसके चमत्कारों की कथा आज भी कही-सुनी जाती है. जहाँ इस अध्याय में प्रो अग्रवाल अत्यंत रूमानी अंदाज़ में कबीर-कथा कर रहे हैं, वहीं पिछले अध्याय के तेवर भी बरकरार हैं. तथ्यों-तर्कों के बगैर कुछ भी लिख-पढ़ देने वाले विद्वानों की ख़बर लेना वह नहीं भूलते.

अगला अध्याय कबीर की रचनाओं-उपरचनाओं की बहस से मुखातिब है और पांचवें अध्याय में रामानंद और कबीर के गुरु-शिष्य संबंधों का अध्ययन है. इन दो अध्याओं के बाद लेखक कबीर की साधना और भक्ति का विश्लेषण करते हुए साबित करता है कि कबीर को धर्मगुरु, अवतार या पंथ-प्रवर्तक के रूप में देखना उनके साथ अन्याय है. कबीर तो संगठित धर्मों की आलोचना भर नहीं कर रहे थे, बल्कि वह तो धर्म-मात्र के विक्लप की खोज में थे तथा उनकी भक्ति भागीदारी और उच्च मानवीय आदर्शों के पक्ष में खड़ी थी. प्रो. अग्रवाल इस संवेदना और ज्ञान-मीमांसा को तत्कालीन परिवेश में फलित देशज आधुनिकता के घटक के तौर पर देखते हैं और आज के विमर्श को उससे संवाद की सलाह देते हैं.कबीर के नारी-विषयक विचार पसोपेश में डालते हैं. एक तरफ नारी-निंदक कबीर हैं जो साधक को नारी से बचने का निदेश करते हैं, वहीं दूसरी तरफ वह स्वयं नारी बनकर राम का मनुहार करते हैं और वह भी कामपरक और दैहिक शब्दों का सहारा लेकर. प्रो. अग्रवाल इधर-उधर का तर्क देकर या आँख फेर कर इस द्वंद्वात्मक स्थिति से कबीर को बचाने की कोशिश नहीं करते, बल्कि इसे समझने की कोशिश करते हैं. इस कोशिश में वह दो महत्वपूर्ण बात कहते हैं – संस्कारजनित आदर्शों के कारण नारी-निंदा का आग्रह है जो उनकी सीमा है, लेकिन उनकी बेचैनी कविता के अपने स्वभाव और पुरुष शरीर में स्त्रीत्व के अंश होने के चलते उभयलिंगी होने के बोध के कारण उनकी नकारात्मकता से अलहदा प्रेम रचित करती है जिसमें कबीर स्त्री हो जाते हैं. इतना ही नहीं, जिन कारणों से वह साधकों को वर्जित करते हैं, ठीक वही दैहिक संवेदना और इच्छा उनकी कविता में मुखरित होती है. लेखक इस कड़ी में कबीर की प्रेमधारणा में प्रेम की वैचारिकी के बीज देखते हैं जो सामाजिक परिवर्तन को गति दे सकती है.

आखिरी अध्याय कबीर की कविता पर विमर्श है. इसमें कबीर को कवि मानकर पढ़ने की ‘जिद्द’ को समझाने के साथ प्रो अग्रवाल उनके ‘सुनो भई साधो’ संबोधन का निहितार्थ समझाते हैं और उलटबांसी के बारे में लिखते हुए कहते हैं- कविता का अर्थ समग्रता में ही होता है. इसीलिए वह कबीर की कविता में बार बार आए घर और मृत्यु पर विचार करना नहीं भूलते.

परिशिष्ट में कई पद और साखी दिए गए हैं जिन्हें इस किताब को पढ़ लेने के बाद पढ़ना एक अलग ही अनुभूति देता है. निःसंदेह यह किताब कबीर को एक नयी रौशनी में समझने की दृष्टि तो देती ही है, साथ ही अबतक की हमारी ऐतिहासिक समझदारी को भी झकझोर देती है. कबीर के बहाने यह हमारे समय की खोज भी है. यह खोज प्रो पुरुषोत्तम अग्रवाल के लिये भी पूरी नहीं हुई है. इसे तो वह ‘कबीर से संवाद का एक दौर’ कहते हैं. गाँधी के ‘हिंद-स्वराज’ और गुरुदेव के ‘गोरा’ के सौ साल बाद आयी इस किताब को पढ़ना अपने आप से संवाद का एक दौर भी है.

(दैनिक भास्कर में 26 जून 2010 को प्रकाशित)

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