अपनी ज़बान को बचाना अपनी आज़ादी के निशान को बचाना है

ग़ुलामी के अंधेरों में अपनी ज़बान को बचा कर रख पाना कितना दूभर होता होगा, यह वही जानता होगा जिसने उस दौर को झेला होगा और उसे बचा कर आज़ादी के उजास में उस ज़बान में बतियाने और गुनगुनाने का सुख और ख़ुशी भी वही समझ सकता है. स्पेन के कब्ज़े से फिलीपिंस की आज़ादी की लड़ाई में अपना बलिदान देने वाले जोस रिज़ाल ने कहा था कि अपनी ज़बान को बचाना अपनी आज़ादी के निशान को बचाना है. एक सनकी तानाशाह से मुक्ति की लड़ाई में लीबिया के लहूलूहान क़स्बों से एक ख़त्म-सी हो गयी ज़बान को बचाए रखने की एक दिलचस्प दास्तान हमारे सामने आ रही है जो ज़िंदगी की तमाम उम्मीदों को इस खौफ़नाक वक़्त में एक बार फिर ज़िंदा कर जाती है.

Berber_flag.svgअरब या उत्तरी अफ्रीका सिर्फ़ अरबी कबीलों का इलाका ही नहीं है, बल्कि वहाँ हज़ारों साल से मूल बाशिंदों या आदिवासियों की बड़ी संख्या बसर करती है जिन्हें दुनिया आम तौर पर बर्बर जाति के रूप में जानती है जो कि उन जातियों के लिये एक अपमानजनक संज्ञा है. ये जातियाँ अपने को सामूहिक रूप से अमाज़ीर कहती है जिसका मतलब होता है -आज़ाद लोग. बर्बर संज्ञा दरअसल रोमन और यूनानी ‘सभ्यताओं’ की उस सांस्कृतिक हेठी का परिणाम है जो हर उस समुदाय को अपमानजनक नाम दे देती थी जिसकी संस्कृति को वे समझ नहीं पाते थे या जो उनके नियंत्रण को तोड़ने की लगातार कोशिश करता था. हद तो यह है कि हम कई भाषाओं में वीभत्स, घिनौनी और अमानवीय हरकतों के लिये ‘बर्बर’ शब्द का उपयोग करते हैं. ख़ैर, आज के मोरक्को, अल्जीरिया, ट्यूनीशिया और मॉरीतानिया की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा अमाज़ीर है तथा लीबिया और मिस्र आदि कई देशों में उनकी आबादी है. इन सभी देशों में अरबी भाषा और संस्कृति की श्रेष्ठता के नाम पर अमाज़ीर लोगों को अपनी भाषा और संस्कृति के प्रयोग पर कठोर पाबंदियाँ हैं और उन्हें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक शोषण का भी शिकार होना पड़ता है. लीबिया में कर्नल गद्दाफ़ी के बयालीस सालों की तानाशाही में उन्हें साफ़ आदेश था कि वे अपनी ज़बान नहीं बोल सकते, पारंपरिक पोशाक नहीं पहन सकते, अपने तरीके से नाच और गा नहीं सकते थे. यहाँ तक कि उन्हें अपनी भाषा में अपना नाम रखने की भी मनाही थी. उन्हें सब-कुछ अरबी ढंग से करना था. कभी-कभार किसी ने अगर हुक्म मानने में कोताही की तो उसे दंड का भागी होना होता था जिसमें मौत की सज़ा भी शामिल थी. गद्दाफ़ी के क़हर से अमाज़ीर संस्कृति किसी अँधेरे कोने में छुप गयी थी.

लेकिन समय का फेरा! अब गद्दाफ़ी ही अपनी जान बचाने के लिये किसी अँधेरे खोह में जा छुपा है. और दुनिया के लिये बर्बर अमाज़ीर अपने आज़ाद कस्बों में नाच-गा रहे हैं और अरबियों के साथ मिलकर गद्दाफ़ी का मुक़ाबला भी कर रहे हैं. लीबिया में अमाज़ीरों की अधिकतर आबादी नफूसा पहाड़ियों में है. राजधानी त्रिपोली के दक्षिण-पश्चिम में स्थित यह इलाक़ा अभी प्रमुख मोर्चों में है. यहाँ से राजधानी पर कब्ज़े का रास्ता खुलता है. इस इलाक़े का एक कस्बा जादू अमाज़ीर संस्कृति के उदय का केंद्र बना हुआ है. वैसे तो इसकी जनसख्या महज बीस हज़ार है लेकिन अभी यहाँ पर बड़ी संख्या में शरणार्थी हैं जो गद्दाफ़ी की सेना की बमबारी के चपेट में आने वाले इलाकों से आए हैं. जादू की दीवारों पर अमाज़ीर में नारे लिखे हुए हैं तो दुकानों की पट्टियाँ भी बदल दी गयी हैं. खबरों के मुताबिक, पिछले कुछ हफ़्तों से एक रेडियो स्टेशन अरबी और अमाज़ीर दोनों भाषाओं में प्रसारण कर रहा है. इतना ही नहीं, एक प्रकाशन ने चार किताबें भी प्रकाशित कर दी हैं.

गद्दाफ़ी ने अपनी तानाशाही की शुरुआत में कहा था कि जो लोग अमाज़ीर भाषा सीख रहे हैं वे ‘अपनी माँ के स्तन से ज़हरीला दूध’ पी रहे हैं. आज जादू में अमाज़ीर सीखने का विद्यालय भी खुल गया है. गद्दाफ़ी की सनक का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि नफूसा पहाड़ियों के इलाक़े को तानाशाह के नक्शे पर बस पश्चिमी पहाड़ियाँ लिखा गया है. आसपास के इलाक़ों में गद्दाफ़ी की ओर से आज भी यह लगातार प्रचार किया जा रहा है कि पहाड़ों से बर्बर हमले करने वाले हैं.

बावजूद इसके बर्बर और अरबी मिलकर तानाशाह का मुक़ाबला कर रहे हैं. उनका झंडा एक है, कमान एक है और उद्देश्य भी एक है. लेकिन सदियों में पसरा अविश्वास एक दिन में नहीं धुलता. अभी भी अमाज़ीरों और अरबियों में एक दूसरे के लिये संकोच और संदेह है. लेकिन दोनों पक्ष इस बात को लेकर एकमत हैं कि उन्हें एक दूसरे को समझना होगा और यही मौका है. हाँ, इतना ज़रूर है कि इसमें वक़्त लग सकता है. लेकिन साथ होने का मौक़ा तो गद्दाफ़ी ने दे ही दिया है. यह मौका दुनिया के लिये भी है कि वह अनगिनत भाषाओं और संस्कृतियों के प्रति सम्मान का भाव रखना सीखे. कुछ भाषाओं, विचारों, जीवन-शैलियों और धार्मिक मान्यताओं की श्रेष्ठता का दावा कर अनेकों संस्कृतियों का दमन मानवता के हित में नहीं है. हमारे देश में ‘हिंदी, हिन्दू, हिन्दुस्तान’ की पिपिहिरी बजानेवाले ध्यान दें.

20-07-2011 को bargad.org पर प्रकाशित

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